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दोस्तों, हम यह तो जानते हैं कि सकारात्मकता जब आवश्यकता से अधिक हो जाए, तब वह विषाक्त सकारात्मकता का रूप ले लेती है, जो कि हानिकारक है। हम कब इसके शिकार हो जाते हैं, पता भी नहीं चल पाता। यही नहीं, हमारे आसपास लोग इस से ग्रसित हैं, यह पहचानना भी मुश्किल है। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि हम विषाक्त सकारात्मकता की उपस्थिति को पहचानें, और उसे खत्म करें । आइये जानते हैं विषाक्त सकारात्मकता के लक्षण :

☸ यदि किसी समस्या के आ जाने पर आप उसका सामना नहीं कर पाते, और समस्या से भागने लगते हैं, लेकिन साथ ही आप खुद को और दूसरों को यह दिखाने की कोशिश करते हैं आप बिल्कुल सकारात्मक हैं, पूरी तरह से ठीक हैं, तो यह विषाक्त सकारात्मकता का लक्षण है। इसीलिए अवलोकन करें कि कोई समस्या आपको अंदर ही अंदर बहुत ज्यादा परेशान तो नहीं कर रही। यदि आप ऐसी स्थिति में भी केवल दिखावे के लिए सकारात्मक रहने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसे तुरंत बदलें।

☸ यदि कोई व्यक्ति अधि तनावपूर्ण बातें नहीं सुन पाता, और हमेशा उनसे भागने की कोशिश करता रहता है, तो यह भी विषाक्त सकारात्मकता का ही 1 लक्षण है। ऐसे लोगों में यह डर होता है कि नकारात्मक बात सुनने से उनकी सकारात्मकता पर प्रभाव पड़ेगा, इसीलिए सबसे अच्छी बातें कहने को कहते हैं, और यदि कोई अपनी समस्या लेकर आए, तो वह उससे मुंह मोड़ लेते हैं।

☸ यदि कोई व्यक्ति बहुत ही बुरी परिस्थितियों में, जहां समस्या की गंभीरता पर बात करनी चाहिए, वहां भी "सब अच्छा है" ऐसा कहता रहता है, तो वह भी विषाक्त सकारात्मकता से ग्रसित है। ऐसा व्यक्ति सकारात्मकता से समस्या को हल करने पर जोर नहीं देता, बल्कि सकारात्मकता के नाम पर उस समस्या को दबाने की कोशिश करता रहता है।

सकारात्मक होने के लिए क्या जरूरी है

दोस्तों, हम सब जानते हैं कि जीवन में सकारात्मकता को शामिल करना कितना जरूरी है। हर कदम पर आपको खुद को सकारात्मक रखना होगा, तभी जाकर आप जिंदगी की चुनौतियों का डटकर सामना कर पाएंगे। लोग यह जानते हैं, या फिर यह कहे कि वह करना भी चाहते हैं, लेकिन कुछ दिनों के प्रयास में वह हार मान जाते हैं। इसके दो कारण हो सकते हैं, - पहला, कि वे शत प्रतिशत प्रयास नहीं करते, और दूसरा यह, कि वे उन मानकों से भलीभांति परिचित नहीं हैं, जो सकारात्मक होने के लिए आवश्यक है।

पहली समस्या का हल आपके हाथ में है। आपको ईमानदार कोशिश करनी होगी। दूसरी समस्या का हल हम आपके लिए लेकर आए हैं। पेश हैं कुछ सुझाव जो सकारात्मक होने के लिए जरूरी हैं :

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बचपन और जवानी की तरह बुढ़ापा भी जीवन का अभिन्न चरण है, जिससे सभी को होकर गुजरना पड़ता है। बचपन और जवानी का तो लोग बड़ा आनंद लेते हैं, लेकिन बूढ़ापे का ख्याल उन्हें परेशान कर देता है, क्योंकि हमने बुढ़ापे को जीवन का अंतिम एवं कष्टदायक चरण मान लिया है, जहां व्यक्ति अवांछनीय हो जाता है, वह सबके लिए बोझ बन जाता है। पर यह धारणा पूरी तरह गलत है। बुढ़ापा जिंदगी का आनंद लेने का सबसे सुनहरा समय है, व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर खुद के लिए जी सकता है। बुजुर्ग व्यक्ति अनुभवों की खान होता है ।

आपने यह तो सुना ही होगा कि जब तक हम स्वयं से प्यार नहीं करेंगे तब तक दुनिया भी हमसे प्यार नहीं करेगी। इसलिए जब बुजुर्ग व्यक्ति खुद को सशक्त मानेंगे तब दुनिया भी उनका सम्मान करेगी। इसके लिए आपको खुद को लेकर सकारात्मक रहना होगा।

तरीके :

✔︎ खुद को स्वीकार करें और खुद से प्यार करें

✔︎ अपनी झुर्रियों, सफेद बालों, एवं अपने शरीर में आए हर बदलाव को स्वीकार करें, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है। आप जैसे हैं, खुद को उसी रूप में प्यार करें, क्योंकि सुंदरता तन से नहीं, मन से आती है। अच्छे कपड़े पहने, फिट रहें, इससे आपका आत्मविश्वास बढेगा।

✔︎ किसी के ऊपर बोझ ना बनें

✔︎ अपनी जिम्मेदारियां खुद उठाएं। कुछ आए हमेशा संचित कर रखें जिससे आप अपने खर्च उठाने में सक्षम हो। साथ ही खाली ना बैठे, बुझाने का यह मतलब नहीं है कि आप कुछ भी नहीं कर सकते किसी ना किसी काम में खुद को संलग्न रखें।

✔︎ स्वास्थ्य का ख्याल रखना है सबसे जरूरी

✔︎ बुढ़ापे में आप शारीरिक रूप से कमजोर होते जाते हैं। आप अपने काम खुद कर सकें, इसके लिए जरूरी है कि आप स्वस्थ हो। अतः रोज प्राणायाम, व्यायाम या सैर जरूर करें, साथ ही पोषण का पूरा ख्याल रखें।

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आप घर, दफ्तर, पार्क, जिम आदि कई जगहों पर जाते हैं। इनमें से कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जहां जाना आपको बहुत पसंद होता है, जहां आपका मन प्रसन्न हो उठता है। वहीं दूसरी तरफ कुछ जगहों पर जाते ही आपका बना बनाया मूड बिगड़ जाता है। ऐसा क्यों?

इसलिए क्योंकि हर स्थान में परिवेश का अंतर होता है। जहां आपको नकारात्मकता का आभास होता है, वह स्थान आपको दुखी करता है, जहां आपको सकारात्मकता मिलती है, वहां आप अच्छा महसूस करते हैं। आज हम इसी विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं । आज की चर्चा में हम जानेंगे कि सकारात्मक परिवेश में रहने के क्या फायदे हैं !

आइए कुछ बिंदुओं पर गौर करें।

✴ बेहतर संचार

दोस्तों आपने गौर किया होगा, जहां उदासी या नकारात्मकता का माहौल हो, वहां मौन की स्थापना स्वतः हो जाती है। नकारात्मक परिवेश लोगों को अनिच्छा, उदासी, शंका एवं असंतोष की स्थिति में पहुंचा देता है। जिसके परिणामस्वरूप लोगों के बीच संचार का अभाव पैदा हो जाता है, या यह पूरी तरह से गौंण हो जाता है। इसीलिए ऐसी स्थिति में लोग बातें करना कम कर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ ऐसा स्थान, जहां लोग खुश एवं आशावादी हैं, वहां संचार अपनी पराकाष्ठा पर होता है। इसीलिए बेहतर संचार के लिए सकारात्मक परिवेश केवल अच्छा ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है।

✴ तनाव का कम होना

जहां नकारात्मकता होती है, वहां तनाव उत्पन्न होता है। क्योंकि नकारात्मक सोच के प्रभाव में लोग अच्छा होने की उम्मीद छोड़ देते हैं, उनका मन चिंतित हो जाता है। इसका हल सकारात्मक परिवेश को अपनाने में है। जहां लोग खुलकर एक दूसरे से अपने मन की बातें कहते हैं, जहां भविष्य के लिए अच्छा होने की आशा रखते हैं, वहां तनाव अपनी जड़े नहीं फैला पाता। अतः सकारात्मक परिवेश में लोग हंसमुख एवं मिलनसार प्रवृत्ति के होते हैं।

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आपने सकारात्मक दृष्टिकोण के कई फायदों के बारे में सुना होगा। यह सच है कि सकारात्मकता का दामन थामने वाले व्यक्ति के जीवन में खुशियों की सौगात आती है। पर क्या सकारात्मकता का जादू यहीं खत्म हो जाता है ?

नहीं! सकारात्मकता तो आपके जीवन के हर पहलू पर अपना जादू चला जाती है। जिंदगी के प्रति आशावादी रवैया न सिर्फ मानसिक रूप से, बल्कि शारीरिक रूप से भी आपके लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है। यह हम बस यूं ही नहीं कह रहे, विज्ञान ने इसे बाकायदा साबित किया है। क्या आप जानते हैं कई शोधों से यह पता चला है कि गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोग यदि सकारात्मक सोच रखते हैं तो वे लंबी उम्र जी पाते हैं? और बीमारियों का बेहतर ढंग से सामना कर पाते हैं! यह सुनकर आपके मन में जिज्ञासा जरूर जागी होगी कि सकारात्मकता और किन तरीकों से हमारे शरीर पर प्रभाव डालती है।

आइए जानते हैं सकारात्मक दृष्टिकोण का शरीर पर प्रभाव:

प्रतिरोधक क्षमता

विज्ञान के अनुसार नकारात्मक सोच आप की प्रतिरोधक क्षमता में कमी लाती है। वहीं यदि आप सकारात्मक सोचते हैं, तो आप की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत एवं अधिक गुणवत्ता के साथ काम करती है। कहा जाता है कि मनुष्य के विचार उसे कोशिकाओं के स्तर पर प्रभावित करती है। इसीलिए जब आप सकारात्मक सोचते है, तो आपके शरीर एवं स्वास्थ्य में बड़ा सुधार होता है।

तनाव में कमी

तनाव का मूल कारण है चिंता। चिंता तब होती है जब हम निराशावादी हो जाते हैं, अर्थात नकारात्मक हो जाते हैं। य तव और चिंता तब बहुत कम हो जाती है, जब हम अच्छा सोचते हैं। जो व्यक्ति चीजों के अच्छे पहलू पर ध्यान देता है, वह चिंता करने की जगह समस्या के हल पर ध्यान देता है तनाव का कम होना आपको हाइपरटेंशन उच्च रक्तचाप आदि बीमारियों से भी बचाता है।

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आज की चर्चा दो विचारधाराओं पर है। दिनभर हमारे मन में हजारों विचारों का आवागमन लगा रहता है। इन विचारों को हम दो वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं - सकारात्मक विचारधारा एवं नकारात्मक विचारधारा। इस चर्चा में हम इन दो विचारधाराओं के मानव जीवन पर प्रभाव एवं परिणाम पर प्रकाश डालेंगे।अंत में यह भी देखेंगे कि कौन सी विचारधारा आपको अपनानी चाहिए।

तो आइए सबसे पहले जानें कि सकारात्मक एवं नकारात्मक विचार धाराएं क्या है।

सकारात्मक सोच व्यक्ति का वह दृष्टिकोण है, जहां व्यक्ति घटनाओं के प्रति आशावादी रहता है, और उनके उज्जवल पक्ष पर ध्यान देता है। वहीं नकारात्मक सोच उस दृष्टिकोण को कहा जाता है, जहां व्यक्ति लोगों एवं घटनाओं के प्रति निराशावादी रवैया रखते हुए हर घटना को शंकित नजरों से देखता है।

आइए उदाहरण लें, एक व्यक्ति का, जो अपना व्यवसाय स्थापित करना चाहता है। सकारात्मक व्यक्ति व्यवसाय करने के विचार पर विश्वास रखता है, जिससे वह उसके लिए योजनाएं बनाना शुरु करता है। उसके अंदर यह उम्मीद होती है कि वह जरूर सफल होगा। एक चरण ऐसा आता है जहां उसके हाथ असफलता लगती है। लेकिन सकारात्मकता उसे हार नहीं मानने देती। वह पुनः शुरू करता है एवं अंत में सफलता पाता है।

वहीं एक नकारात्मक व्यक्ति व्यवसाय के विचार पर शंका में रहता है वह सोचता है यदि वह असफल हुआ तो क्या होगा असफलता का ख्याल से वह व्यवसाय का विचार छोड़ देता है । उस दिशा में काम करना तो दूर, वह कदम भी नही बढ़ाता।

किसे चुनें?

इस उदाहरण ने आपको दोनों दृष्टिकोणों के प्रभाव एवं परिणाम बता दिए। सकारात्मक व्यक्ति खुश एवं सफल हुआ, बल्कि नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति असफलता, तनाव एवं दुख का शिकार हुआ। जीवन में नकारात्मक रहना आपको कई तरह से हानि पहुंचाता है। सकारात्मकता हर कदम पर आपको आगे बढ़ाती है, इसीलिए जिंदगी में सकारात्मकता को चुनें।

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दोस्तों, जब हम किसी रोग से पीड़ित हो जाते हैं, तब हमारी जिंदगी में बहुत कुछ बदल जाता है। स्वास्थ्य के बिगड़ जाने पर हम शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही रूपों से प्रभावित होते हैं। ऐसे में कई नकारात्मक विचार हमारे मन में आने लगते हैं, कुछ करने की इच्छा नहीं होती, मन उदास सा रहने लगता है, एवं हम अपनी स्थिति को लेकर चिंतित रहने लगते हैं। हमारा इस प्रकार तनाव में आना स्थिति की गंभीरता को और भी बढ़ा सकता है। इससे बीमारी के बढ़ने के आसार भी बढ़ जाते हैं ।

कई शोधों में यह पाया गया है कि सकारात्मक दृष्टिकोण बीमारी से बेहतर रूप से लड़ने में मददगार साबित होता है। इसीलिए आपको खुद को सकारात्मक रखने का प्रयास करना चाहिए। पेश है कुछ सुझाव :

✴ व्यायाम करें

अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यायाम से बेहतर और क्या हो सकता है? निरंतर व्यायाम एवं प्राणायाम का अभ्यास आपकी बीमारी को बहुत हद तक नियंत्रण में कर सकता है। साथ ही, आपका मन शांत, स्थिर, एवं सकारात्मक रहता है। इसीलिए हर रोज सुबह जल्दी उठकर खुली हवा में व्यायाम जरूर करें। आप चाहे तो ध्यान भी लगा सकते हैं। बुजुर्ग व्यक्ति सैर करके भी खुद को स्वस्थ रख सकते हैं।

✴ लोगों से मिले जुले

बीमारी की स्थिति में अक्सर लोग मायूस हो जाते हैं। दिन भर अपनी बीमारी के बारे में सोचते रहने से मन दुखी हो जाता है। ऐसे में अपने माहौल को बदलें। परिवार के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताएं। दोस्तों, रिश्तेदारों से मिले-जुले, बातें करें, हंसी मजाक करें। आपके अपनों से मिला प्यार एवं सहानुभूति आप को सकारात्मक रहने के लिए प्रेरित करेगा।

✴ खान पान

केवल पौष्टिक भोजन करें। बीमारी को हराने के लिए शरीर को उत्तम पोषण की आवश्यकता होती है। अतः अच्छा खायें, एवं अधिक से अधिक सात्विक भोजन करें।

निराश लोगों को सकारात्मकता की ओर प्रेरित करने के लिए सुझाव.jpg

रोजमर्रा की जिंदगी में हम कई ऐसे लोगों से मिलते हैं, जो जीवन से निराश हो चुके हैं। वह जीवन जी तो रहे हैं, किंतु उनमें जीने की चाहत, जुनून खत्म हो चुकी है। हिम्मत हार चुके ऐसे लोगों के लिए आशा की एक किरण भी संजीवनी साबित हो सकती है, जिससे उनके अंदर जीवन जीने की चाहत, जुनून और कुछ कर दिखाने का हौसला फिर से जाग उठे।

आप भी किसी के लिए आशा की वह किरण बन सकते हैं। जब भी जिंदगी आपको यह मौका दें तो किसी की मदद जरूर करें। गौर करें इन बिंदुओं पर जिससे आप अपने अपनों की मदद करत सकते हैं :

✴ उन्हें सकारात्मक परिवेश में ले जाएं

मन की निराशा तब और भी बढ़ जाती है, जब व्यक्ति के आसपास का परिवेश एवं वातावरण भी नकारात्मक हो जाए। इस परिस्थिति में व्यक्ति नकारात्मकता के जाल में उलझता ही जाता है। ऐसे में उस व्यक्ति को ऐसी जगह पर ले जाए, जहां वह अच्छा महसूस करें। यहां उनकी कोई पसंदीदा जगह हो सकती है, या कोई पार्क हो सकता है, जहां बच्चों को खेलता कूदता देख, लोगों को हंसते, बातें करता, आनंद लेता देख उस व्यक्ति के मन में भी खुल कर जीने की इच्छा जागे। ऐसा कई दिनों तक करते रहने से आप व्यक्ति में कई सकारात्मक बदलाव होते देख पाएंगे।

✴ उनके हौसले को बढाएं

बार-बार लोगों द्वारा अपने लिए नाकामयाब असक्षम, अयोग्य जैसे शब्द सुन सुनकर व्यक्ति स्वयं को वास्तव में अयोग्य समझने लगता है। वह अपनी क्षमताओं पर पूरी तरह से विश्वास खो देता है। उन्हें दोबारा आत्मविश्वासी बनाने के लिए उनके गुणों, उनकी प्रतिभाओं की सराहना करें, उनकी तारीफ करें, उन्हें बताएं कि वे सशक्त हैं। आपके यह शब्द उनके मन को शांति भी पहॅुचाएंगे और साथ ही उनका खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापस लौटेगा।

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परीक्षा का दिन कई छात्रों के लिए सबसे तनावपूर्ण दिनों में से एक होता है । उनका मन घबराहट और चिंता से भरा रहता है। यही नहीं, कई छात्र तो प्रश्न पत्र देखकर ही इतना घबरा जाते हैं, कि वह सब कुछ भूल जाते हैं। नकारात्मक विचार उनके मन को इस तरह ढक देते हैं, कि वह कुछ और सोच ही नहीं पाते। इसका परिणाम यह होता है कि कड़ी मेहनत के बावजूद भी वे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। यह स्थिति चिंताजनक है। अतः आवश्यक है कि छात्र नकारात्मकता को खत्म करें।

✴ परीक्षा का दिन अत्यधिक व्यस्त ना बनाएं

कई छात्र परीक्षा से 1 घंटे पहले तक भी पढ़ाई करते रहते हैं, पर यह आपके लिए अच्छा नहीं है। परीक्षा में वही ज्ञान काम आता है, जो आपने पहले से अर्जित किया है। 1 घंटे पहले पढ़ने से आपका ज्ञान बढे या ना बढ़े, तनाव जरूर बढ़ जाता है। इस वक़्त आपको अपने मन को शांत रखने की आवश्यकता होती है, ताकि आप पढ़ी हुई चीजों का स्मरण कर सके। किंतु छात्र इसका उल्टा करते हैं । इसीलिए परीक्षा के पहले खुद को शांत रखें।

✴ भोजन

आप में से कितने हैं जो परीक्षा के वक्त जल्दबाजी में खाने में कटौती करते हैं? कई छात्र तो कुछ भी नहीं खाते । ऐसा करना अच्छा नहीं है। परीक्षा में आप तब ही पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर पाएंगे, जब शरीर सही अवस्था में हो। इसीलिए कुछ पौष्टिक भोजन कर के ही परीक्षा के लिए जाएं।

✴ प्रश्नों का चुनाव

जो प्रश्न आपको नहीं आते हैं उनकी चिंता लेकर बैठ जाने से आप बाकी प्रश्न भी सही से हल नहीं कर पाएंगे, और आपका समय नष्ट होगा । समय नष्ट हुआ तो स्वाभाविक है आप तनाव में आ जाएंगे। अतः पहले उन प्रश्नों को करें जो आपको आते हैं।

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1 ) अपने विचारों को सकारात्मक रखो क्योंकि आपके विचार आपके शब्द बन जाते हैं। शब्दों को सकारात्मक रखें क्योंकि आपके शब्द आपके व्यवहार बन जाते हैं। अपने व्यवहार को सकारात्मक रखिए क्योंकि आपका व्यवहार आपकी आदतें बन जाते हैं। अपनी आदतों को सकारात्मक रखिए क्योंकि आपकी आदतें आपके मूल्य बन जाते हैं। अपने मूल्यों को सकारात्मक रखें क्योंकि आपके मूल्य ही आपके भाग्य बन जाते हैं ।

- मोहनदास करमचंद गांधी

2 ) आप मन के स्वामी है मन आपका स्वामी नहीं है। आप इसे जिस दिशा में ले जाएंगे यह उसी दिशा में जाएगा। अब दिशा का चुनाव आपके हाथों में है।

3 ) " मेरे पास यह नहीं है", ऐसा सोचने से आपके पास वह वस्तु कभी नहीं आएगी, क्योंकि आपका अवचेतन मन आपके विचारों के अनुसार ही परिस्थितियां बनाता है। "मेरे पास यह है", ऐसा सोचने से आपका अवचेतन मन प्रकृति के हर नियम का इस्तेमाल कर आपको वह वस्तु दिलाएगा।

4 ) सकारात्मकता बहुत सरल सिद्धांत पर आधारित है। जैसे हर रात के बाद दिन का होना निश्चित है, वैसे ही जीवन में सकारात्मकता का प्रवेश निश्चित है। अब यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह दिन हो जाने के बाद भी आंख बंद कर सोता रहता है, या जागता है।

5 ) जो कहते हैं हमारा भविष्य विधाता ने तय किया है वह भूल जाते हैं कि हम स्वयं अपने विधाता हैं।

6 ) सकारात्मकता का अर्थ समस्या का ना आना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है समस्या को सुलझा पाना।

7 ) सकारात्मकता उस पोषण की तरह है, जो आपके मस्तिष्क की हर कोशिका में आशा रूपी ऊर्जा का संचार करती है। कुपोषण केवल शरीर में नहीं, विचारों में भी हो सकता है । जिस प्रकार पोषण की कमी से शरीर कुपोषित हो जाता है, उसी प्रकार सकरात्मकता की कमी से विचार कुपोषित हो सकते है।

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आजकल सकारात्मकता पर कई चर्चाएं हो रही है। जीवन के विभिन्न पहलुओं पर इसके प्रभावों को जाना जा रहा है। सच में, यह कोई चमत्कारिक भावना जैसी प्रतीत होती है जिसमें जीवन को बदल सकने की ताकत है। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि यह हमारे अंदर ही मौजूद है। पाठकों, क्या आप जानते हैं कि सकारात्मक दृष्टिकोण का प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ता है?

जी हां! सकारात्मक रहकर हम अपने स्वास्थ्य को बहुत बेहतर बना सकते हैं। आज के लेख में हम सकारात्मकता और स्वास्थ्य के बीच के संबंध पर प्रकाश डालने की कोशिश करेंगे।

✴ तनाव से मुक्ति

जब जीवन में सकारात्मकता का प्रवेश होता है, तब नकारात्मकता स्वतः ही निष्कासित हो जाती है। नकारात्मकता का जाना, अर्थात अच्छे विचारों का आना। जब व्यक्ति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है, तब वह समस्याओं से ना ही चिंतित होता है, बल्कि बेहतर रूप से सामना कर पाता है। इससे व्यक्ति खुश और तनाव मुक्त रहता है। तनाव की जड़ है चिंता, और सकारात्मकता चिंता को पूरी तरह खत्म करने में सक्षम है। तनाव से उत्पन्न विभिन्न बीमारियां जैसे उच्च रक्तचाप, हाइपरटेंशन, एनजाइना, डिप्रेशन, हृदयाघात माइग्रेन, सिर दर्द भी आपको नहीं जकरेंगी, और एक अच्छे स्वास्थ्य का उपहार आपको मिलेगा।

✴ रक्त का बेहतर संचार

दोस्तों, चिंता एवं नकारात्मक विचारों का सीधा-सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। कई शोध यह सिद्ध कर चुके हैं कि हमारे विचार हमारे स्वास्थ्य पर बहुत गहरा असर डालते हैं । चिंता की स्थिति में हमारी श्वास, रक्त वाहिकाएं एवं रक्त वाहिकाओं में रक्त का संचार सभी बुरे रूप से प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत जब हम सकारात्मक होते हैं, तो हम खुलकर श्वास ले सकते हैं, हमारी रक्त वाहिकाएं सक्रिय हो जाती हैं, हम उत्साहित होते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप खून का संचार और बेहतर रूप से होता है।

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मित्रों, किसी भी आदत को जीवन का हिस्सा बनाने के लिए दो चरणों में काम करना होता है। पहले चरण में आदत को विकसित करना होता है, और दूसरे चरण में उसे बनाए रखना होता है अर्थात, निरंतरता। दूसरा चरण थोड़ा आसान होता है किंतु आदत विकसित में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। ऐसी ही एक आदत है सकारात्मकता की आदत, जिसे विकसित करना कई लोगों को बहुत कठिन लगता है। उनका तर्क होता है कि हर तरफ इतनी नकारात्मकता फैली हुई है, कि हम चाह कर भी अच्छा नहीं सोच पाते हैं।

इस लेख में जानिए सकारात्मक सोच विकसित करने के तरीके :

☸ अच्छी संगति :

लोगों की सबसे बड़ी शिकायत है कि वह खुद को तो सकारात्मक रख लेते हैं, लेकिन आससपास के कारण उनका मनोबल कमजोर पड़ने लग जाता है। यह सच है कि सकारात्मकता केवल आप तक ही नहीं, आपके आसपास भी होनी चाहिए। इसीलिए आपको अपनी संगति पर ध्यान देना होगा। उन लोगों से निकटता ना बढ़ाएं जो आपको अच्छा महसूस नहीं करवाते। उनके साथ रहें, जिनका व्यवहार और वाणी आपको सकारात्मकता की ओर प्रेरित करे।

☸ आभार प्रकट करें :

आभार प्रकट करना अर्थात, जीवन में दूसरों के योगदान के प्रति कृतज्ञता। दूसरों से मिला प्रेम आपके मन को खुश करता है, आप सकारात्मक होते हैं। उन लोगों, या चीजों के बारे में सोचें, जिन्होंने बीते क्षणों मे आपको खुशियां दी हैं, उन सभी को धन्यवाद करें। ऐसा कम से कम रोज़ करने की कोशिश करें।

☸ भाषा में करें कुछ बदलाव :

यदि हम अपनी भाषा पर गौर करें, तो पाएंगे कि दिनभर में हम हजारों शब्द ऐसे इस्तेमाल करते हैं, जो नकारात्मकता के प्रतीक है। बार-बार ऐसी बातें करने से आपके विचार और व्यवहार भी उसी रूप में ढल जाते हैं। अतः अपनी भाषा में सुधार करें । अपने वाक्यों से "नहीं" जैसे शब्दों को निकाल दें।

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ऐसी महिलाएं जो नौकरी भी करती हैं, उन्हें घर और दफ्तर की भी जिम्मेदारियां उठानी पड़ती है। ऐसी महिलाओं के लिए दफ्तर से मिली छुट्टी के बाद का वक्त भी घर के कामों को निपटाने में निकलता है। ऐसे में तनाव होना अति स्वाभाविक बात है। यह तनाव केवल मन को ही नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से भी महिलाओं को प्रभावित करता है, जिससे उनके रोजमर्रा के काम भी प्रभावित होते हैं।

ऐसे में सकारात्मक रहने के लिए हमारी महिला पाठक अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव कर सकती हैं। पेश हैं कुछ सुझाव :

✴ सबसे पहली प्राथमिकता खुद को दें:

खुद पर ध्यान देना और अपना ख्याल रखना स्वार्थी होना नहीं है। आप दूसरों का ख्याल तब ही रख पाएंगे जब आप पूरी तरह से स्वस्थ हो। दिनभर कामों में आप खुद के लिए वक्त नहीं निकाल पाती। ना खाने का ठिकाना होता है, ना ही पीने का। इस आदत को तुरंत बदलें। खाना समय पर खाएं, कुछ भी ना खा ले, और सुबह व्यायाम जरूर करें। जब आप स्वस्थ होंगे तभी आप अपने काम का आनंद ले पाएंगी।

✴ आराम :

यह एक ऐसी चीज है जिसके लिए किसी के पास वक्त नहीं होता। लोग आराम को कभी महत्व नहीं देते। पर आराम उतना ही जरूरी है जितना कि आपका काम। यदि आप 5 मिनट भी छोटी सी झपकी ले ले, या लेट जाए, तो आप खुद को पहले से अधिक तरोताजा पाएंगी। इसीलिए पर्याप्त नींद और आराम ले।

✴ अत्यधिक गंभीरता को छोड़ें :

रोजमर्रा की परेशानियों और जिम्मेदारियों के बीच हम इतने घिर जाते हैं, कि हर वक्त गंभीर रहते हैं। खासकर महिलाओं को गंभीर एवं शालीन रहने की शिक्षा दी जाती है। ऐसा हर वक्त ना करें। दफ्तर में सबके साथ खुशी से हंसते हंसाते काम करें और घर पर भी खुलकर हंसे, सबसे बातें करें।

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आज का लेख उन विद्यार्थियों के लिए है जिन्हें स्कूल जाना बिलकुल अच्छा नहीं लगता। कुछ बच्चे तो बड़ी प्रसन्नता से विद्यालय जाते हैं, पर कुछ इसके नाम से ही चिढ़ जाते हैं। इसका एकमात्र कारण केवल पढ़ाई ना करने की इच्छा नहीं है, बल्कि कई अन्य कारक होते हैं जिससे बच्चे स्कूल जाने की प्रति अनिच्छा व्यक्त करते हैं, और अगर जबरदस्ती चले भी जाए, तो पूरे दिन उदास रहते हैं। ऐसे बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए ही आज का लेख है। आइए जानते हैं कैसे विद्यार्थी स्कूल में सकारात्मक रह सकते हैं :

✴ बच्चों को परिस्तिथि का सामना करना सिखाएँ :

स्कूल जाने की अनिच्छा का एक बहुत बड़ा कारण होता है कक्षा की अन्य बच्चे। कुछ अच्छे, तो कुछ बदमाश बच्चे हर कक्षा में होते हैं, जो अपने साथियों को परेशान करते रहते हैं। कुछ बच्चे इस व्यवहार को सहन नहीं कर पाते हैं । वे इन बदमाश साथियों से डर जाते हैं और उनसे भागने लगते हैं। ऐसे में यह अभिभावकों का कर्तव्य है कि बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाए। उन्हें परिस्थिति से डरने ना दें और उनके विचारों को इतना मजबूत बनाएं, कि वह खुद शिक्षक से शिकायत कर सकें। एक बार बच्चा परिस्थिति का सामना करना सीख गया, तो वह स्कूल के प्रति सकारात्मक होने लगेगा।

✴ उनका मनोबल बढ़ायें

दोस्तों, हर बच्चों की क्षमता अलग-अलग होती है। पढ़ाई में कोई बहुत अच्छा, कोई और औसत, तो कोई कमजोर होता है। ऐसे में अपने से बुद्धिमान बच्चों को शिक्षकों की प्रशंसा पाते देखकर बच्चे हीन भावना का शिकार होने लग जाते हैं। उनका कोमल मन खुद को लेकर नकारात्मक होने लगता है और वह समझने लगते हैं कि वह कमतर है। आप उन्हें बताएं कि वह किसी से कम नहीं है। उनका मनोबल बढ़ाएं जिससे वे खुद को लेकर आत्मविश्वासी बने रहे।

क्या अत्यधिक सकारात्मकता हानिकारक है - विषाक्त सकारात्मकता.jpg

जीवन में सकारात्मक होना अच्छा ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है । मुश्किल घड़ियों में सकारात्मकता की छोटी सी किरण आपके हौसले को वापस जिंदा कर सकती है। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि सुख और दुख जीवन की अभिन्न अंग है। कई बार दुख व्यक्त करना बहुत आवश्यक होता है। ऐसे में भी हर वक्त केवल सकारात्मकता की बात करना अच्छे से अधिक नुकसानदेह साबित हो जाता है।

क्या है विषाक्त सकारात्मकता?

आवश्यकता से अधिक सकारात्मकता विषाक्त सकारात्मकता है। ऐसे वक्त आते हैं, जहां आप अपनी समस्याओं के बारे में बात करना चाहते हैं, उन्हें व्यक्त करना चाहते हैं लेकिन हर पल सकारात्मक रहने का विचार आपको ऐसा करने नहीं देता। आपने तय कर लिया होता है, कि आप बुरी चीजों के बारे में ना तो सोचेंगे, ना तो बात करेंगे। इससे आपके मन का दुख आपके मन के अंदर ही दब जाता है । आप बाहर से तो यह दिखाते हैं कि सब कुछ ठीक है, लेकिन दबी हुई भावनाएं आपको अंदर ही अंदर परेशान करती रहती हैं। यही है विषाक्त सकारात्मकता।

एक और पहलू पर गौर करें। आजकल सकारात्मकता ट्रेंड सा बन गया है। हम हमेशा अच्छी बातें करने एवं अच्छा सोचने के लिए कहते हैं, बिना यह जाने कि सामने वाला व्यक्ति किन परिस्थितियों से जूझ रहा है। इससे दूसरों तक संदेश जाता है कि आप केवल अच्छी बातें सुनना चाहते हैं, उनकी समस्याओं को नहीं। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपनी समस्याओं को आपके साथ साझा नहीं कर पाता है। आपकी सकारात्मकता दूसरों के लिए विष बन जाती है।

तो दोस्तों, सकारात्मकता और विषाक्त सकारात्मकता के बीच के अंतर को समझें। जीवन में बुरी बातों को भी साथ देना पड़ता है। सकारात्मक होने की दौड़ में कब आप टॉक्सिक पॉजिटिविटी के शिकार हो जाते हैं, आपको पता भी नहीं चलता। अतः सतर्क रहें।

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दोस्तों, आज की चर्चा एक गंभीर विषय पर है। इस बदलते समय में महिलाएं पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। केवल घर ही नहीं, बल्कि ऑफिस की जिम्मेदारियां भी निभा रही हैं। ऊपरी तौर से देखने पर यह बहुत आसानी से चलता दिखाई देता है, लेकिन घर, बच्चे, काम सब एक साथ संभालना बहुत कठिन है। इस प्रक्रिया में अक्सर महिलाएं दबाव और तनाव से ग्रसित हो जाती हैं।

घर और काम में संतुलन बनाते-बनाते अक्सर उन्हें दबाव पूर्ण स्तिथियों में काम करना पड़ जाता है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है । इसीलिए आज इतनी सारी महिलाएं किसी न किसी गंभीर मानसिक या शारीरिक रोग की शिकार बनती जा रही हैं।

अभी तक हमने यह देखा कि महिलाओं को इस स्थिति में परिवर्तन की कितनी जरूरत है। अब हम समाधान की बात करेंगे।

इसका हल यह नहीं है कि महिलाएं दफ्तर या घर के कामों से किनारा कर लें । इसके लिए एक बहुत ही सरल और प्रभावी उपाय जो आप अपना सकती हैं, वह है सकारात्मक दृष्टिकोण। सकारात्मक दृष्टिकोण आपके लिए उपयोगी है, क्योंकि अपनी जिम्मेदारियों को कम करना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन काम के प्रति आपके नजरिए को बदलना आपके हाथों में ही है।

सकारात्मकता से मैत्री कैसे करें?
पाठकों, रोजमर्रा के कामों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाने के लिए आपको अपने नजरिए में कुछ बदलाव करने होंगे :


✴ जिम्मेदारियों को बोझ ना समझें
✴ पूरे दिन का काम पहले से तय करें और फिर व्यवस्थित रूप से काम करें
✴ एक बहुत अच्छा तरीका है कि अपने काम का आनंद लें, बीच-बीच में अंतराल लें
✴ स्वास्थ्य का बहुत अधिक ख्याल रखें व्यायाम और ध्यान करना कभी ना भूले
✴ इसके अलावा अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिताएं, खुलकर हंसने से कभी ना कतराए

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विषाक्त सकारात्मकता, अर्थात टॉक्सिक पॉजिटिविटी वह स्थिति है, जहां व्यक्ति उन परिस्थितियों में भी सकारात्मकता की परिकल्पना को हावी कर लेता है, जहां उसका होना नुकसानदेह साबित होता है। सरल शब्दों में कहें तो, जरूरत से अधिक सकारात्मकता विषाक्त सकारात्मकता है। अति हर चीज की बुरी होती है। यह आपके साथ दूसरों के लिए भी हानिकारक है। इसीलिए इसे पहचानें और इससे बचें।

आज हम आए हैं ऐसे ही सुझावों के साथ जो आपको विषाक्त सकारात्मकता से बचने में मदद करेंगी :

✴ भावनाओं को दबाए नहीं :
हमें लगता है कि सकारात्मक होना मतलब किसी भी बुरी चीज के बारे में बात नहीं करना है। इस सोच के चलते हम समस्या के बारे में बात भी नहीं करना चाहते हैं। ऐसा करने से हम बाहर से तो यह दिखाते हैं कि सब अच्छा है, लेकिन अंदर से यह भावनाएं हमें विचलित करती रहती हैं। जब तक आप दबी भावनाओं को बाहर नहीं निकालेंगे, तब तक अच्छा महसूस नहीं कर सकते। इसीलिए समस्या पर बात करें, उन्हें साझा करें। जब बुरी भावनाएं निकल जाएंगी, तभी अच्छी भावनाओं का प्रवेश संभव है।

✴ दूसरों को सुनें :
सकारात्मकता आजकल एक ट्रेंड सा बन गया है। असल जिंदगी हो, चाहे सोशल मीडिया, हर जगह हम सकारात्मक रहने की, पॉजिटिव वाइब्स की बात करते हैं। ऐसे में अनजाने में ही सही, पर आप अपने चारों तरफ ऐसा घेरा बना लेते हैं, जहां दूसरे व्यक्ति की समस्याओं का निषेध होता है। लोग आपसे अपनी समस्याएं व्यक्त नहीं कर पाते हैं। आप खुद ऐसी बातें सुनना नहीं चाहते जो दुःख या तनावपूर्ण स्थिति पैदा करती हों। यदि आप ऐसा कर रहे हैं, तो आप ना सिर्फ टॉक्सिक पॉजिटिविटी के शिकार हैं, बल्कि उसे बढ़ावा भी दे रहे हैं। दूसरों की समस्याएं सुनें, इससे आप नकारात्मक नहीं होंगे, बल्कि दूसरों को शांति दिला सकेंगे।

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दोस्तों, आपके अंदर एक ऐसी ताकत है, जो अद्वितीय है, वह है सकारात्मकता की ताकत। अब आप कहेंगे, यह तो केवल एक भावना है, फिर हम इसे अद्वितीय शक्ति क्यों कह रहे हैं?

इसलिए क्योंकि सकारात्मकता वह भावना है, जो जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल सकती है। जब व्यक्ति सकारात्मक होता है तब उसके जीवन के हर पहलू में बदलाव आते हैं। हम आपको बताने जा रहे हैं सकारात्मकता का व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है :

उत्पादकता:

सकारात्मकता अपने साथ यह विश्वास लाती है, कि आप किसी कार्य को बेहतर तरीके से कर सकते हैं। साथ ही आप जो भी करते हैं उसे मन लगाकर करते हैं। आपमें यह चाहत जागती है कि दिए गए काम को और बेहतर ढंग से किया जाए। इससे आप की उत्पादकता कहीं अधिक बढ़ जाती है।

बेहतर स्वास्थ्य:

दोस्तों आप तो जानते ही हैं कि तनाव के कारण दुनिया भर में कितने ही लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं। सकारात्मक रवैया आपको समस्या का हल ढूंढने के लिए प्रेरित करता है, जिससे आप समस्या से चिंतित होने की जगह उसे हल करने पर जोर देते हैं। आपके अच्छे विचार तनाव को आप से कोसों दूर रखते हैं, जिससे डिप्रेशन, माइग्रेन, सिरदर्द, हाइपरटेंशन, एनजाइना जैसी भयानक बीमारियां होने का खतरा कम हो जाता है।

सफलता:

जीवन में सफल वही होते हैं, जो कुछ करते हैं। कुछ करने की प्रेरणा आपको तब मिलती है जब आपके अंदर यह विचार आता है कि आप इस काम को जरूर कर सकते हैं। किंतु ज्यादातर लोगों का मन शंकाओं से घिरा होता है, नकारात्मक विचार बहुत जल्दी हमारे मन में बैठ जाते हैं। ऐसे में सकारात्मकता ही है जो आपकी मन में दृढ़ निश्चय का बीजारोपण करती है। जिसके सहारे आप एक-एक कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते जाते हैं।

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आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे विषय पर, जिस पर बहुत से लोग चर्चा करना चाहते हैं। ये वह लोग हैं, लोग जो सकारात्मक तो रहना चाहते हैं, पर दिन बीतने के साथ ही उनका निश्चय कमजोर पड़ने लगता है। ऐसे लोग घर से तो पूरी तरह मन बना कर निकलते हैं कि हम सकारात्मक रहेंगे, लेकिन अपनी बात पर अधिक देर तक बने नहीं रह पाते हैं, क्योंकि केवल मन में सोच लेना ही काफी नहीं है। आपको असल जिंदगी में भी कई बदलाव करने होंगे । तो आइए जानते हैं कि दिन भर आप किस तरह सकारात्मक बने रह सकते हैं :

व्यायाम और ध्यान

स्वस्थ विचारों का को निवास के लिए स्वस्थ शरीर की आवश्यकता होती है। यदि शरीर स्वस्थ ना हो, तो विचार भी अधिक देर तक सकारात्मक नहीं रह सकते।आवश्यक है कि शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाए। रोज 20 मिनट तक व्यायाम एवं ध्यान करें। व्यायाम से शरीर में स्वस्थ आयु एवं रक्त का प्रवाह होगा और ध्यान से आपके मन मस्तिष्क में स्वस्थ विचारों का प्रवाह होगा और सकारात्मकता का संचार होगा।

मनोरंजन

व्यस्तता और ढेर सारे काम के बीच तनाव होने की संभावनाएं और बढ़ जाती हैं। ऐसे में थोड़ा समय निकालकर वह करें, जो आपको खुशी देता है। संगीत का आनंद लें, कुछ मनोरंजक पढ़ें, या वह करें जो आपको पसंद हो।

परिवार के साथ वक्त बिताएं

परिवार से बेहतर चिंता निवारक और कौन हो सकता है। घर के सभी सदस्यों से बात करें, उनके दिन के बारे में पूछे, साथ बैठकर खाना खाएं, हंसी मजाक करें। यह आपको तनाव से कोसों दूर रखेगा और आप सकारात्मक रह पाएंगे।

✴ ऐसे लोगों की संगति करें जो आपको अच्छा महसूस कराते हों। उनसे दूरी बना कर रखें जिनकी बातें और व्यवहार आपको बुरी तरह प्रभावित करते हों।

बच्चों के लिए घर का माहौल कैसे सकारात्मक रखें.jpg

हम बड़े तो परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं, और खुद पर परिस्थितियों के प्रभाव को भी नियंत्रित कर लेते हैं। किंतु बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। हर घटना का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में उनके सही विकास के लिए यह बहुत जरूरी है कि घर के वातावरण से उन्हें अच्छी सीख मिले, और कोई घटना उनके मन पर नकारात्मक प्रभाव ना डाल पाए। जब घर का माहौल तनावपूर्ण या नकारात्मक होता है, तब बच्चे भी इससे प्रभावित होते हैं । अतः यह अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि आप घर का माहौल सकारात्मक रखें।

आइए जानते हैं कि आप घर के माहौल को सकारात्मक बनाने के लिए क्या कर सकते हैं :

✴ वाद-विवाद से बच्चों को दूर रखें। परिवार में गलतफहमियां या छोटे-मोटे झगड़े होते रहते हैं। लेकिन कई लोग बच्चों के सामने ही एक दूसरे से वाद-विवाद करने लग जाते हैं। अपने से बड़ों को इस तरह लड़ता देख बच्चे बहुत अधिक सहम जाते हैं। इससे वह तनाव में आ सकते हैं और कई स्थितियों में तो बच्चों को बड़ों के क्रोध का भाजन भी बनना पड़ता है। इस स्थिति को पूरी तरह से और फौरन खत्म कर दें। विवाद हो भी तो बच्चों की अनुपस्थिति में सुलझा लें ताकि बच्चे इन मामलों से दूर अपनी प्यारी सी दुनिया में खुश रह सकें।

✴ अत्यधिक अनुशासन और सख्ती से बचें। बच्चों को अनुशासित करना जरूरी है। लेकिन यह उनके लिए नियम से अधिक बंधन न बन जाए, इसका ख्याल आपको ही रखना होगा, नहीं तो बच्चों को घर किसी जेल जैसा लगने लगेगा। खेलकूद, मस्ती, हंसी मजाक बच्चों के विकास में जरूरी भूमिका निभाते हैं। इसीलिए बच्चों के साथ प्यार से पेश आएं, पढ़ाई भी करवाएं और खेलकूद भी करने दें । अनुशासन और ढील, दोनों में संतुलन बनाकर चलें।