अपने अंदर की झिझक को कैसे मिटाएं.jpg

दोस्तों, झिझक या शर्म हम सबों में होती है। किसी में अधिक, तो किसी में कम, लेकिन सब लोग कभी न कभी किसी न किसी स्थिति में शर्माते हैं। किंतु कुछ व्यक्ति तो ज्यादा लोगों के सामने कुछ बोल ही नहीं पाते।

यह झिझक चिंता का कारण तब बनती है, जब यह आपके विकास में बाधा बन जाती है। तब, जब झिझक के कारण आपकी हानि होने लगे, पढ़ाई या नौकरी में आपका प्रदर्शन खराब होने लगे, या रोजमर्रा के कामों में भी परेशानी खड़ी हो जाए, तब आपको सजग हो जाने की आवश्यकता है। इसे इतना न बढ़ने दें कि आप कुछ भी करना चाहें तो शर्म के कारण पीछे हट जाए।

स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब यह शर्म बीमारी का रूप ले लेती है, जिसे ऐरिथ्रोफोबिया कहते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति बात-बात पर शर्म आने लग जाता है। तो अपनी शर्म को खत्म करें, ताकि आप हर क्षेत्र में शत-प्रतिशत प्रदर्शन कर पाएं।

आत्मविश्वास को बल दे :

झिझक का मुख्य कारण है खुद पर विश्वास की कमी। हम हमेशा खुद को कम करके आंकते हैं । हमें लगता है कि हम में कुछ भी अच्छा नहीं है, और सामने वाले हम पर हसेंगे। पर यह केवल आपकी सोच है। सच्चाई ऐसी नहीं है। खुद पर विश्वास रखें और हीन भावना मन में ना आने दे। अपनी कमजोरियों को भी आत्मविश्वास के साथ स्वीकार करें, और अपनी क्षमताओं पर भी भरोसा रखें। यह मानें कि आप अपने आप में खास हैं।

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दिन भर सोते रहना कितना अच्छा लगता है ना !

हम उन दिनों की कल्पना करते हैं, जब हम सिर्फ आराम करें। न जाने कितने ही कामों को न करने की इच्छा के कारण हम बहाने बना लिया करते हैं। यह अनिच्छा ही आलस्य है, जिसे हमारे शास्त्रों में मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु कहा गया है। आइए इस श्लोक को पढ़ें :

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्

आधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतो सुखम्

अर्थात आलस करने वाले को विद्या कहां? जिसके पास विद्या नहीं, उसके पास धन कहां? निर्धन व्यक्ति के पास मित्र कहां? और मित्र के बिना सुख कहां?

इसीलिए आप भी सावधान हो जाएं, और आलस करना छोड़ें।

उपाय :

अनुशासन में रहें और नियम बनाएं

आलस को खत्म करने के लिए आपको स्वयं को अनुशासित करना होगा। खुद के लिए कड़े नियम बनाएं, और उन नियमों को तोड़ने की इजाजत खुद को ना दें। मन के बहकावे में बहकने से खुद को रोकें, और मन ना होने पर भी किसी भी काम को नजरअंदाज ना करें।

नियम टूटने पर सजा के लिए तैयार रहें

खुद के बनाए नियम तोड़ना आसान है, क्योंकि आपको सजा देने वाला कोई नहीं होता। हम बड़ी आसानी से तय किए गए नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं इसीलिए नियमों के साथ सजा भी तय करें। जब भी नियम टूटें, तो खुद को कड़ा दंड दें। इससे आपको ना चाहते हुए भी आलस को त्यागना ही होगा।

खुद को सक्रिय बनाएं

ऐसी क्रियाओं में स्वयं को संलग्न करें, जिनमें आपकी सक्रियता बढे। सुबह दौर लगाएं, शारीरिक कार्य करें, खेल खेले इत्यादि। इससे आपकी आलसी प्रवृत्ति बदलेगी और आप सक्रिय हो पाएंगे।

दृढ़ संकल्प

बिना दृढ़ संकल्प के आपके सारे प्रयास निरर्थक रह जाएंगे। इसीलिए मन में ठान लीजिए, कि आपको आलस छोड़ना है। साथ ही बीच-बीच में स्वयं को इस दिशा में बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करें।

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कृतज्ञता अथवा ग्रैटिट्यूड का अर्थ है उन लोगों या चीजों के प्रति शुक्रगुजार होना, जिन्होंने आपके लिए कुछ अच्छा किया हो।

जिंदगी में कई बुरे वक्त आते हैं, जब आप कमजोर पड़ने लगते हैं, ऐसे में वे लोग जिन्होंने आपकी मदद की हो, आपके मुस्कुराने की वजह बने हों, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता दिखाना ही ग्रैटीट्यूड कहलाता है। आभार प्रकट करने की आदत ना सिर्फ आपको अच्छा व्यक्ति बनाती है, बल्कि इसका आपकी जिंदगी पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि आप रोज लोगों एवं चीजों को आभार प्रकट करें, तो आपको इससे जबरदस्त फायदे मिलेंगे।

तो आइए जानते हैं आभार प्रकट करने से आपके जीवन में क्या बदलाव आते हैं :

सुधरता है मानसिक स्वास्थ्य

मनोवैज्ञानिक तौर पर आभार प्रकट करना आपके लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। आभार प्रकट करने से नकारात्मक विचारों, क्रोध, असंतोष, झुंझलाहट, दुख आदि बहुत हद तक कम होते हैं, क्योंकि जब आप शुक्रिया अदा करते हैं, तब आपका मन उन घटनाओं को याद कर खुश होता है। दूसरे द्वारा की गई मदद आपके दुखी मन पर औषधि की तरह काम करती है, जिससे तनाव दूर होता है और आप अधिक सकारात्मक बनते हैं।

अच्छी नींद

अच्छी नींद का सीधा संबंध आपकी मनः स्थिति से है। तनावग्रस्त लोगों में अक्सर नींद की कमी देखी जाती है। आभार प्रकट करने के दौरान आपके विचारों में सकारात्मकता आती है, जिससे मन शांत एवं स्थिर होता है। परिणामस्वरूप आपकी नींद और बेहतर होती है। सोने से पहले 10 मिनट भी ऐसा करने से आप अच्छी नींद का लुफ्त उठा सकते हैं।

बेहतर संबंंध

लोगों के प्रति कृतज्ञता का अर्थ है उनके लिए विश्वास, आदर, एवं प्रेम विकसित करना। इन भावनाओं को जब आप लोगों से व्यक्त करते हैं, तब लोगों के मन में भी आपके लिए यही भावना पनपती है, जिससे संबंध बेहतर बनते हैं।

क्या आप जानते हैं खज़ाना आपके अंदर ही छिपा है ?

नहीं समझे?


मतलब यह कि जिन सवालों के जवाब हम बाहर ढूंढने की कोशिश करते हैं, वह आपके अंदर ही मौजूद हैं। आपका मन एक अथाह समुद्र की तरह है, जिसमें दिनभर हजारों लहरें उठती रहती हैं। पर हम अपने मन की कितनी बातें सुनते हैं?


कई बार तो मन चीख कर हमसे कुछ कहने की कोशिश करता है, पर हम उसे बड़ी आसानी से अनसुना कर देते हैं।

विचार वान व्यक्ति श्रेष्ठ होता है। केवल इसीलिए नहीं क्योंकि उसके मन में उत्तम विचारों का निवास होता है, बल्कि इसीलिए भी क्योंकि वह विचारों के महत्व समझता है। हम जीवन में जो भी करते हैं विचारों के प्रभाव में आकर ही करते हैं। उत्तम विचार निरंतर कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते हैं।

वहीं दूसरी ओर जब हम कुछ गलत अथवा अनैतिक करते हैं, तब कई बार हमारे विचार हमें गलत ना करने की सलाह देते हैं। अब यह हमारे ऊपर है कि हम इन विचारों को कितना महत्व देते हैं। यदि हमने उस समय विचारों की अनदेखी की, तो एक अनैतिक कार्य जीवन भर हमें ग्लानि में डुबोता रहेगा। वहीं यदि विचार रूपी मार्गदर्शक की बातें हमने सुन ली, तो यह हमें जीवन भर श्रेष्ठ कर्म करते रहने का बल प्रदान करेगा।

यह तो जीवन की केवल एक परिस्थिति है। ठीक ऐसा ही जीवन के हर पड़ाव में होता है। विचारों की कद्र करने वाला व्यक्ति गुणों एवं श्रेष्ठताओं से संपन्न होता है।

जितना महत्वपूर्ण विचारों को महत्व देना है उतना ही महत्वपूर्ण उन्हें नियंत्रण में रखना है। जिस प्रकार समुद्र की लहरें कभी-कभी बहुत उफान पर आ जाती हैं, और किनारों पर ठहरी रेत को बहाकर ले जाती हैं, उसी प्रकार मन के अनियंत्रित और चंचल विचार आपको अपने वेग में बहाकर ले जा सकते हैं।

जिंदगी एक रेस की तरह है, कोई आगे निकल जाता है, तो कोई पीछे रह जाता है। ऐसे में दो तरह के लोग होते हैं - एक, जो हार मान कर बैठ जाते हैं, और दूसरे जो कोशिश भी नहीं करते । इस प्रतियोगिता भरी जिंदगी में जहां रास्ते में कई कठिनाइयां हैं, वहां खुद को विकास के पथ पर अग्रसर किए रहना मुश्किल है।

यदि आप भी किसी इंसान को जानते हैं तो उसे प्रेरित करने के लिए अपनाये सुझाव :

जोखिम के नुकसान नहीं फायदे बताएं :

दोस्तों, नए काम को करने में जोखिम होता ही है । विकास ना कर पाने वाले लोगों के मन में यह बात घर होती है कि "अगर असफल हुए तो क्या होगा? " इस डर से वे उस दिशा में कदम भी नहीं बढ़ाते। आप उन्हें बताएं कि जोखिम सिर्फ नुकसान ही नहीं देते, बल्कि कई फायदों की सौगात लेकर आते हैं। दुनिया के सफलतम व्यक्तियों का उदाहरण दें।

☸ उनका मनोबल बढ़ाएं :

आगे बढ़ने के लिए जरूरी है मेहनत, और मेहनत करने का बल मन की शक्ति से आता है। जो लोग विकसित नहीं हो पाते उनमें आत्मविश्वास और सकारात्मकता की कमी होती है। आप उनकी छुपी हुई इच्छा शक्ति को जगाने का माध्यम बनें। उनकी क्षमताओं और प्रतिभाओं से उन्हें अवगत कराएं, उनके हौसले को बढ़ाएं, प्रेरित करें। सकारात्मकता भरे आपके विचार धीरे-धीरे उनके मन को प्रभावित करेंगे ।

☸ जीवन में हार का सही मतलब सिखाएं :

जीवन में हार से मिली उपेक्षा और नुकसान इंसान को आगे बढ़ने से डराते और रोकते हैं, क्योंकि हार की परिभाषा हमने बहुत गलत बना ली है। हार को हम असफलता का मानक समझने लगते हैं। ऐसे लोगों को समझाएँ कि हार एक सीख है, जिससे जिंदगी के बहुमूल्य अनुभव मिलते हैं। बिना हारे जीत मुमकिन नहीं है।

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समय का महत्व समझाएँ

बचपन की सीख जीवन भर की आदत बन जाती है। जीवन में सफल होने के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है समय का सदुपयोग। बचपन में ही यह शिक्षा बच्चों को दे दी जाए, तो बड़े होकर उन्हें समय प्रबंधन में कोई कठिनाई नहीं होगी। बच्चों का दिन खेलकूद, पढ़ाई आदि में ही निकल जाता है। उन्हें समय का ध्यान रखना सिखाएं और सिखाएं कि किस तरह वे खाली समय का उपयोग कर सकते हैं।

अनुशासन

अनुशासन के बिना सफलता पाना संभव नहीं है। बड़े होकर लोगों को स्वयं को अनुशासित करने में बहुत तकलीफ होती है, और अनुशासन के अभाव में जीवन में वह सफल नहीं हो पाते हैं। इसीलिए, अनुशासन को बच्चों के जीवन का हिस्सा बनाएं। उनका एक टाइम टेबल तय करें, और इसी के अनुसार हर काम समय पर करवाएं।

रोज़ जीवन मुल्य का पाठ पढ़ाएं

दोस्तों, सफलता का आधार केवल मेहनत या अनुशासन नहीं है। बिना संस्कार के सफलता यदि मिल भी जाए, तो वह ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं होगी। एक व्यवसाई यदि अपने कर्मचारियों की इज्जत ना करें, उनके योगदान को ना समझे, तो क्या ऐसा व्यवसाय टिक सकता है ?

इसीलिए अपने बच्चों को रोज़ एक अच्छी बात सिखाएं। उन्हें आचार सिखाएं, बड़ों का आदर करना सिखाएं, ईमानदारी और सच्चाई के मूल्य बताएं जिससे वे आगे जाकर ना सिर्फ सफल बने, बल्कि अच्छे इंसान भी बनें।

मेहनती बनाएं

आजकल माता-पिता अपने बच्चों को ऐशो आराम की जिंदगी देना चाहते हैं। ऐसा सोचना बहुत अच्छी बात है, पर जब बच्चों को हर चीज बिना किसी मेहनत के मिलने की आदत हो जाती है, तब वे बड़े होकर इसी आराम भरी जिंदगी के आदि हो जाते हैं और मेहनत से कतराने लगते हैं। इसीलिए बच्चों को शुरू से ही मेहनती बनाएं, उन्हें काम सौंपे, खुद अपने काम करने की आदत डलवाएँ, ताकि वह आलसी ना बनें।

चोरी -

यदि कोई व्यक्ति चोरी करता है और वह यह सोचता है कि ऐसा करने से वह अपने जीवन में खुशियां और अपनी जरूरतों को हासिल कर सकता है I तो यह उसकी बहुत बड़ी भूल है I चोरी करते वक्त आपको इस बात का अंदाज़ा नहीं होगा कि अगर आपका यह रूप सबके सामने आ गया तो आपका चरित्र किस कदर नष्ट हो जाएगा I चोरी एक बहुत ही बुरी आदत है जो इंसान के चरित्र को बरबाद कर देता है I किसी की वस्तु, पैसा, या सामान चुरा के कोई कभी अमीर नहीं बन सकता जबकि खुद की नजर में भी गिर जाएगा।

निंदा -

निंदा को अपने अंदर से हटाना चाहिए I हम किसी की बुराइयों को दोष को लेकर चर्चा करते हैं तो ऐसा करने से हम उस व्यक्ति का नही, जबकि खुद का चरित्र नष्ट कर देते हैं। हमे खुद के अंदर की बुराइयों को निकालना चाहिए I ना कि दूसरो कि बुराइयों को कर के अपने आप को बड़ा करें, यह चरित्र पर एक गलत प्रभाव डालता है।

झूठ -

झूठ वह कीड़ा है जो आपको खोखला कर देता है I झूठ से बना कोई रिश्ता, कोई भी कार्य, कभी भी सफल नहीं हो सकता I यदि कोई एक सच को छुपाने के लिए दस झूठ का सहारा ले रहा तो वह बहुत गलत कर रहा है I जो भी बात हो उसे साफ-साफ बोल देना चाहिए I झूठ बोल कर हम उस बात को और गलत बना सकते हैं I साथ ही हमारा चरित्र भी नष्ट हो जाता है। जो व्यक्ति झूठ बोलता है, लोग कभी उसकी बातों पर भरोसा नहीं करते I कई बार अगर वह सच भी बोले फिर भी उसे झूठा है समझा जाएगा I क्योंकि उसका चरित्र ही इसी प्रकार लोगों के सामने बन जाता है।

यह तीनों बातें इंसान अगर अपने अंदर रखेगा तो यह उसके चरित्र को पल भर में नष्ट कर देगा।

अन्य भावों की तरह क्रोध भी स्वस्थ मानवीय भावना है। मनुष्य के अंदर इस भाव का होना पूर्णतः प्राकृतिक एवं समान्य है। किंतु यह असामान्य तब बन जाता है जब हम इसे काबू नहीं कर पाते हैं। अनियंत्रित क्रोध व्याधि के समान होता है, जिसके परिणाम स्वरूप हम मानसिक, भावनात्मक, एवं सामाजिक समस्याओं से घिर जाते हैं।

गुस्से में कही हुई बातों का नतीजा मतभेद और लडाई - झगड़े के रूप में सामने आता है। यदि हम गुस्से पर काबू पा लें, तो लड़ाई एवं कलह से बच सकते हैं।

इससे पहले कि क्रोध आप पर नियंत्रण कर ले, आप इस पर नियंत्रण करना सीख लें।आइये जानें कुछ उपाय :

गहरी सांस लें।

प्रतिकूल परिस्तिथियों में हम क्रोध के आवेग में बहते चले जाते हैं। ऐसे में कुछ गहरी साँसें लें, जिससे आपका मन मस्तिष्क शांत हो। फिर ठंडे दिमाग से सोंचे कि स्थिति को किस प्रकार संभाला जा सकता है।

सात्विक भोजन करें।

हमारे खान पान का गहरा असर हमारे व्यवहार पर पड़ता है। कहते हैं न, जैसा अन्न, वैसा मन। तामसी प्रवृत्ति का भोजन करने से मन उत्तेजित रहता है और ऐसे लोग छोटी-छोटी बात पर भड़क उठते हैं। वहीं सात्विक भोजन करने से मन शांत रहता है। इसलिए यदि आप भी अतिक्रोधी हैं तो लहसुन, अदरक, प्याज़, तली भुनी चीज़ें, मांसाहार इत्यादि से दूर रहें।

चुप हो जाएँ।

दोस्तों, जब व्यक्ति को गुस्सा आता है तब वह बहुत कुछ बोल जाता है। कई बातें दूसरों को चोट पहुँचा देती हैं या लडाई का कारण बन जाती है I गुस्से में आपा खो देने से बेहतर है कि आप चुप हो जाएँ।

स्थल छोड़ दें।

जब भी गुस्सा आप पर हावी होने लगे, तो कुछ अनर्थकारि करने से बेहतर है बाहर चले जाएं और कुछ देर टहलें। सिर्फ 5 मिनट की सैर भी आपके गुस्से को शांत कर सकती है।

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क्या अधिक महत्वपूर्ण है?

भावना अथवा क्रिया?

अकसर हम असमंजस में रहते हैं कि भावनाओं पर ध्यान दें या कर्म करें। यह बहस भी बहुत पुरानी है कि दोनों में से किसकी महत्ता अधिक है। लेकिन सत्य तो यह है कि दोनों का अपना अपना महत्व है। क्रिया के बिना भावना अधूरी है और भावना के बिना क्रिया।

भावनाहीन मनुष्य क्रिया कैसे कर पाएगा? किसी भी कार्य को करने के लिए विचार (भावना) ज़रूरी है, और भावना साकार रूप तब पाती है जब उसे कर्म के रूप में व्यक्त किया जाए। भावनाओं के आवेग में बह कर क्रिया को प्रभावित करना उचित नहीं है, ठीक वैसे ही भावनाओं को दबा कर किये गए कर्म का कोई अर्थ नहीं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

तो फिर कैसे तय हो कि किसकी महत्ता अधिक है?

महत्ता न केवल भावना की है, न अकेले क्रिया की।

महत्ता है दोनों के समागम की।

अर्थात, "भावनायुक्त क्रिया" की।

भावना युक्त क्रिया

भावना युक्त क्रिया का अर्थ है, ऐसी क्रिया जिसमें एक विशेष विचार, एक विशेष भावना निहित हो।

जब हम भावना विशेष के अनुसार क्रिया करते हैं, तब वह क्रिया उत्तम एवं गुणकारी परिणाम देने वाली होती है। श्रेष्ठ क्रिया वह है, जिसका अंकुर कल्याण की भावना रूपी बीज से स्फुटित हुआ हो।

यदि भावना कल्याणकारी न हो कर किसी के अहित या गलत मनशा की ओर इंगित हो, तब वह क्रिया विनाशकारी सिद्ध होती है।

‌तो इस लेख में हमने जाना कि भावनाएं ही क्रिया की दशा एवं दिशा तय करती हैं। अतः सदा मन में अच्छे विचारों और जन कल्याण की भावना को पोषित करना चाहिए।

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हम हमेशा ज्यादा और बेहतर चाहते हैं। एक बेहतर नौकरी, बेहतर घर, बेहतर स्वास्थ। चाहत तो बहुत है, पर क्या हम ये सब हासिल कर पाते हैं? अगर जवाब ना में है तो इसके पीछे क्या कारण है?

पहला, संकल्प का आभाव और दूसरा, जानकारी की कमी। कई बार लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें क्या करना चाहिए। इसीलिए हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे तरीके, जिससे आप एक बेहतर जीवन की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं।

✴ तय दिनचर्या

दिनचर्या का तय होना मतलब हर काम करने का एक निश्चित समय। सोने, जागने, खाने, पढ़ने आदि सभी कामों का एक समय तय करें, और रोज़ उन्हें उसी वक़्त पर करें। तय दिनचर्या आपके जीवन में अनुशासन, स्थिरता, अविरोध जैसे मूल्य लेकर आती हैं। साथ ही निश्चितता होने पर आपका मस्तिष्क और शरीर दोनो ही बेहतर काम करते हैं।

✴ न बुरा बोलें, न बुरा सुनें।

दूसरों की बुराई करने वाले या लोगों में हर दम नुख्स निकालने वाले व्यक्ति संकुचित मानसिकता के होते हैं। अतः लोगों की बुराई न करें, दूसरों की अच्छाइयाँ देखे, उनमे ऐब न निकालें। ऐसे लोगों से दूर रहें जो सदैव बुरा बोलते हैं। अपने आसपास शुद्ध और सकरात्मक घेरा बना कर ही आप विचारों में शुद्धि पा पाएंगे।

✴ चकाचौंध के पीछे न भागे।

चकाचौंध भरी दुनिया झूठ और दिखावे की बुनियाद पर खड़ी होती है। इससे खुद को दूर रखें। अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों से जुड़ कर ही आप सुंदर जीवन का आनंद ले पाएंगे। जीवन के सत्य को पहचाने।

✴ हमेशा कुछ नया सीखते रहें।

चाहे आप उम्र के किसी भी पड़ाव में क्यों न हो, पढ़ने और सीखने की चाहत को कभी खत्म न होने दें। नवीन सीखते रहने वाला व्यक्ति जीवन को अंतिम क्षण तक जीता है। रोज़ कुछ नया पढ़ेंगे तो रोज़ नई सीख मिलेगी।

खुद पर यकीन रखने से हमे अपने अंदर एक बहुत ही बेहतर हौसला मिलता है।

हम लोगों से उम्मीद करते हैं कि वह हम पर भरोसा करें हमारे कामों पर भरोसा करें पर क्या कभी आपने यह सोचा है कि आपको खुद पर कितना यकीन है I क्या आपको पता है कि आप अपना कार्य बेहतर तरीके से कर सकते हैं ? क्या आपको पता है कि आप एक बेहतर इंसान हैं या आप क्या कर सकते हैं ?आपके अंदर कितना हौसला है ? आपके अंदर कितनी शक्ति है?

तो आइए इस बारे में एक विशेष चर्चा करते हैं कि खुद पर यकीन क्यों और कैसे रखें -

खुद पर यकीन रखने का मतलब है हमे अंदर से एक ऐसी शक्ति मिलती है जो हमे मजबूत बनाती है। किसी और को खुद पर भरोसा दिलाने से पहले हमे खुद पर खुद यकीन रखें I क्योंकि अगर हम खुद पर भरोसा करते हैं तो हम लोगों को इस बात का यकीन दिला सकते हैं कि हमारे अंदर क्या खूबियां है और हम अपने कामों को कितना अच्छे से कर सकते हैं।

किसी भी रिश्ते की बात हो या किसी काम की, किसी बिज़नेस की बात हो या कोई जॉब की, अगर आप किसी और से जुड़ रहे हैं तो आपको विश्वास की बहुत जरूरत होती है।

इसी तरह अगर हम किसी चीज की शुरुआत कर रहें है चाहे वह कोई रिश्ता हो या कोई काम, हमे खुद पर भरोसा रखना बहुत ही ज़रूरी है I यदि हम खुद पर भरोसा नहीं रखेंगे तो हम कोई भी काम सफल तरीके से कर ही नहीं सकते।

जब हम खुद पर यकीन करेंगे तो ही हम लोगो को भी यकीन रखवा सकते हैं और खुद पर यकीन करने से हमारे अंदर की शक्ति हमारे चेहरे से छलकती है। जो कि हमारे जीवन में बहुत ही आवश्यक होता है।

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मित्रों, हम जानते हैं कि कोई भी पूर्ण नहीं होता। हम सब में कुछ गुण हैं, तो कुछ अवगुण भी हैं। लेकिन हम अपनी कमियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जबकि हमें उन गुणों को निखारना चाहिए जो ईश्वर ने हमें दिया हैं। अपनी खूबियों को पोषित करना, कुछ अच्छी आदतें सीखना और बुरी आदातों को दूर कर देने से हम खुद को बेहतर बना सकते हैं।

✴ कभी घमंड न करें :

खुद पर या अपनी चीज़ो पर रोब दिखाना घमंड है। घमंडी इंसान खुद को सबसे श्रेष्ठ और दूसरों को नीचा दिखाने में लगा रहता है। इससे न केवल दुसरों के सम्मान को ठेस पहुँचती है, बल्कि वे लोग आपसे दूर भी होने लगते हैं। आपकी छवि, आदर, इज़्ज़त, मानवता को नष्ट कर देता है।

✴ समय की महत्ता को समझें

समय किसी के लिए नहीं रुकता। यदि आपने समय का सदुपयोग नहीं किया, तो जीवन में कुछ अच्छा नहीं कर पाएंगे। खुद को बेहतर बनाने के लिए समय का उपयोग लक्ष्य प्राप्ति में, कुछ नया सीखने, कुछ उत्पादक करने में लगाएं।

किसी का निरादर न करें।

आदर सत्कार, विनम्रता, सम्मान जैसी भावनाएं आपको मनुष्य के रूप में दयालु एवं संवेदनशील बनाती हैं। बड़े और छोटों, दोनों का आदर करें। झुकना सीखें। इससे आपमें दया जैसे गुणों का विकास होता है।दूसरों को सम्मान दे कर ही आपको सम्मान प्राप्त होगा।

इर्ष्या भाव से रहें दूर और करें खुद से प्यार

जलन बहुत बुरी भावना है इससे केवल आपका ही ह्वास होता है। इर्ष्या का अर्थ हुआ कि आप दूसरों की विशेषताओं और प्रतिभाओं से हीन महसूस करते हैं। ऐसा वही करते हैं जिन्हें खुद से प्यार नहीं होता। इसीलिए अपनी विशेषताओं पर गर्व करें और दूसरों की सफलता को सहर्ष स्वीकारे।

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हम सब के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा घटित हुआ होता है, जिसे चाह कर भी हम नहीं भूल पाते हैं। कुछ घाव तो वक़्त के साथ भर जाते हैं, पर कुछ नासूर बन कर चुभते रहते हैं। हम बार-बार उस प्रकरण को याद कर के सोंचते हैं "काश ऐसा न हुआ होता", " यह कितना बुरा हो गया "। इसमे कोई दो मत नहीं कि अतीत की कड़वी स्मृतियों को भूलना आसान नहीं है। लेकिन उससे बाहर न निकलना आपके वर्तमान के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। आप ऐसे सोंच कर देखिये कि अगर आप अतीत में इसी तरह उलझे रहे तो आपका वर्तमान जब अतीत बन जाएगा, तो वहाँ भी आप खुद को उन्हीं उधेर बुनों में फँसा पाएंगे। इसीलिए जो आज है, उसमे खुश रहने की वजह ढूँढिये।

इसके लिए आपको अपने जीवन में कुछ बदलाव करने होंगे। सबसे पहले तो जो कुछ भी बीत चुका है, उसे स्वीकार करें और संकल्प करें, कि जो हुआ है उसकी परछाई आप वर्तमान पर नहीं पड़ने देंगे। जब भी आपका मन इन विचारों से घिरने लगे, तब यह सोंचे कि कुछ भी हो जाए आप आज का दिन यह सब सोंचते हुए नहीं गवाएंगे।

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दूसरी ज़रूरी चीज़ है आत्मविश्वास बढ़ाना। ऐसी चीज़ें करे जिससे आपका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस खड़ा हो सके। ख़ुद का ख्याल रखें, वेशभूषा पर ध्यान दें। जब आप अच्छे दिखते हैं तो आपमें विश्वास बढ़ता है।

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अपने जीवन के लक्ष्य को फिर से पाने में जुट जाएँ। जो समय हाथ से निकल गया, उसे जाने दें। जो समय बचा है, उसका उपयोग करें और नज़रें केवल लक्ष्य पर टिका दें। आप जितने व्यस्त होंगे, उतना ही कम अपने अतीत के बारे में सोचेंगे।

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"आज मेरा मन प्रसन्न है"

"मेरे मन में कई सवाल हैं"

कई वाक्यों में हम "मन" शब्द का प्रयोग करते हैं।

पर यह "मन" आखिर है क्या?

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मस्तिष्क मन नहीं है। मन हमारे मस्तिष्क की वह चेतना है, आत्मा है। मन वो हिस्सा है, जो तमाम तरह के विचारों का घर है।

शरीर स्थूल है, यह दिखाई देता है, छुआ जा सकता है। परंतु मन केवल महसूस किया जा सकता है। आप इसकी तुलना हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर से कर सकते हैं। आईये इसे और अच्छे से समझते हैं।

मन विचारों का जन्म दाता है। परंतु यह मस्तिष्क से अलग है। मस्तिष्क तार्किकता के नियमों पर चलता है, किंतु मन स्वच्छंद है, यहाँ तर्क वितर्क नहीं होते। यह अपार शक्तियों का भंडार है । यही हमें इच्छा, चिंतन, स्मरण, भावना, चुनाव इत्यादि की चेतना प्रदान करता है। यदि शरीर रथ है, तो मन सारथी। इसी के दिखाये रास्ते पर हम चलते हैं। यह सारथी हमें सन्मार्ग, सफलता, सुख, शांति, विकास के पथ पर भी ले जा सकता है, या फिर दुःख, असफलता, रोग, आशांति एवं पतन के पथ पर ले जा सकता है। आप किस रास्ते चलना चाहते हैं, यह आप तय कर सकते हैं। कैसे? जवाब नीचे है।

कैसे साधे मन पर नियंत्रण

कैसे साधे मन पर नियंत्रण

मित्रों, मन शक्तिशाली तो है, किंतु बहुत चंचल भी है। इसकी इच्छाएँ अनंत हैं। मन को नियंत्रण में रखना भी आवश्यक है। चंचलता और गंभीरता का मेल होना चाहिए। इसीलिए मन की शक्तियों, क्षमताओं, और चंचलता को पहचानिये। आपका जीवन सफलता और खुशियों से भर जाएगा।

मन को नियंत्रित करने के उपाय:

✴ ध्यान करें

✴ बुरी संगति से बचें

✴ सीमाओं को पहचाने

✴ सकरात्मक सोंचे

हम सभी चाहते हैं कि हमारी याद्दाश्त बेहतरीन हो, कई सारी चीज़ें हम याद रख सकें। छात्र चाहते हैं कि वे जो कुछ भी पढ़ें, वह उन्हें हमेशा याद रहे। ये सब तब मुमकिन है जब आपका दिमाग तेज़ हो। लेकिन ये होगा कैसे?

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तो जान लीजिये कि एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग रह सकता है। यदि आप ऐसा सोंचते हैं कि केवल दिमागी स्वास्थ पर ध्यान देकर आप अपने लक्ष्य को पा लेंगे, तो यह संभव नहीं। इसीलिए दिमाग के साथ साथ स्वास्थ को भी ठीक रखना होगा, क्योंकि तेज दिमाग का रास्ता स्वस्थ शरीर से हो कर गुज़रता है।

आज आप जानेंगे कि स्वस्थ शरीर और तेज़ दिमाग का मेल कैसे पाएँ।

⚫ व्यायाम करें, तन और मन, दोनों होंगे स्वस्थ

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व्यायाम केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ भी बेहतर करता है। व्यायाम में इतनी शक्ति है कि कई असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं। साथ ही, योगाभ्यास, ध्यान, एवं प्राणायाम से:


एकाग्रता बढ़ती है

दिमाग शांत एवं स्थिर होता है

पढाई में मन लग पता है

यद्दाश्त तेज़ होती है

⚫ अच्छा खान पान

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जैसे शरीर के बाकी अंगो को पोषण की आवश्यकता है, ठीक उसी तरह दिमाग भी मांगता है पोषण! स्वस्थ खान पान से शरीर और दिमाग दोनों चुस्त- दुरुस्त होते हैं। इसीलिए ऐसा खाना खायें जो पोषक तत्वों से भरपूर हो। फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, अंकुरित बीज, दूध, दही इत्यादि करें शामिल।

⚫ अच्छी नींद लें, और दिमाग की बत्ती जलाएं।

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नींद का दिमाग और शरीर से गहरा संबंध है। शरीर को पर्याप्त आराम, अंगों को ख़ुद का शोधन करने के लिए नींद बहुत ज़रूरी है। साथ ही नींद में ही दिमाग सारी जानकारियों को वापस जीवित करी हैं। नींद से दिमाग की कोशिकाएं स्वस्थ रहती हैं। अच्छी नींद तेज दिमाग की चाबी है। इसीलिए पर्याप्त नींद लें।

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जो आज है, वह वर्तमान है, यही वर्तमान बीतने के बाद अतीत का रूप ले लेता है। कुछ घटनाएं अच्छी, और कुछ बहुत बुरी होती हैं, जो हमारे मन पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। कभी कभी अतीत इतना बुरा होता है, कि उनकी भयानक यादें हमें सोने तक नहीं देतीं। बीते हुए कल को भूलना ही होगा, नहीं तो यही कल हमारे भविष्य की कहानी लिखेगा। अतीत को भविष्य न बनने दें। आगे बढ़ना ही ज़िंदगी हैं।

हम बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे तरीके जो बुरे कल की यादों को मिटाने में आपकी मदद करेंगे।

⚫ जो हुआ है, उसे स्वीकार करें।

सबसे पहले आप ये जताना बंद करें कि अतीत से आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा जताने वाले लोग अंदर ही अंदर घुट रहे होते हैं। एक तरफ आप उसे याद नहीं करना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उसे भूल भी नहीं पाते हैं। आप बस अतीत से भाग रहे होते हैं। जो भी हुआ है उसे स्वीकार करें।

⚫ बुरी यादें ही नहीं, बुरे लोगों को भी भुला दें।

कई लोग होते हैं, जिन्हें इससे से कोई लेना देना नहीं होता कि आप पर क्या बीत रही है। वे बार बार आपके अतीत को कुरेदने की कोशिश में लगे रहते हैं। बेहतर है ऐसे लोगों को छोड़ दिया जाए। रिश्तें तोड़ना ज़रूर मुश्किल है, पर जब रिश्तें आपको तोड़ने लेगें, तो तुरंत ऐसे लोगों से दूर हो जाएं।

⚫ दबी हुई भावनाओं को बाहर निकलना है ज़रूरी।

जो कुछ भी बुरा आपके जीवन में घटा है, वह बाहर निकाले बिना आप अतीत से पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। दबी हुई भावनाएं आपको अंदर ही अंदर कचोटते रहते हैं। अतः अपने विश्वस्पात्र से अपनी दिल की बातें बयान करें, नहीं तो डायरी में सबकुछ लिख डालें, या जी भर कर रो लें और अपना दिल खाली कर दें।

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एकाग्र मन की शक्ति बहुत होती है -

यदि कोई व्यक्ति यह करने में सफल हो गया तो उसे कोई भी कार्य करने में असफलता का सामना नहीं करना पड़ेगा। मनुष्य को सबसे ज्यादा आवश्यक होता है उसके मन को समझना, मन से अगर वह किसी कार्य को लेे के या किसी रिश्ते को ले के सहमत है तो उसे उसमे किसी भी प्रकार की कठिनाइयां नहीं देखने मिलेगी।

एकाग्र मन हो तो मनुष्य कोई भी कार्य अपने मुताबिक बेहतर तरीके से कर सकता है।

जब किसी को पढ़ाई करना हो अपने जीवन के लक्ष्य को तैयार करना हो या कोई भी कार्य करना हो अगर उसका मन ही एकाग्र हो तो वह यह सभी कार्य आसानी के साथ कर सकता है।

अगर आपका मन निश्चित रूप से सिर्फ एक ओर किसी भी कार्य में लगा हो तो यह तय है कि आप वह कार्य को बहुत ही आराम से पूरा कर लेंगे।

मन एकाग्र होने से आपको बेचैनी नहीं होगी जबकि आप किसी भी प्रोग्राम को किसी भी मीटिंग को अच्छे से संभाल लेंगे और आपको उसमे अच्छा भी लगेगा।

यदि आपका मन पूरी तरह से एकाग्र है तो आपको हर छोटी सी छोटी चीज को अच्छे से मनाने का मन होगा।

आपको खुश रहने का मन होगा क्योंकि अगर प्रसन्न मन से जो कार्य किया वह सफल होगे तो आपको भी खुशियां मिलेगी।

मन एकाग्र होने से मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं है I अगर कोई व्यक्ति किसी चीज की खोज कर रहा है या कोई बहुत बड़े बिज़नेस के लिए कोई प्लान बना रहा है तो सबसे पहले खुद के मन को एकाग्र करना होगा I यदि आपका मन इधर उधर की देश समाज और दुनिया कि बातों में उलझा रहा तो आप अपने कार्य में सफल नहीं हो पाएंगे।

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मन को कुछ इस प्रकार शांत करें -

मन को शांत रखना बहुत ज़रूरी होता है I क्योंकि यह हमारे लिए आज कल के इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में बहुत मुश्किल हो गया है कि हम अपने मन को शांत रखे I फिर भी यदि हम चाहें तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। खुद को एकांत में रखे जिन लोगो से परेशानियां है उनसे दूर रहें।

वातावरण -

आस पास का वातावरण बहुत ज्यादा निर्भर करता है I मन को शांत रखने के लिए तो हमें ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहां सब कुछ शांत और स्वच्छ हो I ऐसे जगह रह कर खुद को और मन को शांति मिलेगी।

अच्छी बातों को सुनना -

आप खुद के मन को शांत रखने के लिए कुछ ऐसा सुन सकते हैं जिससे आपको आनंद के साथ साथ कुछ अच्छा सीखने को भी मिले और आपको उसे महसूस कर के खुशी मिले, साथ ही सुकून मिले, इससे आपके मन को शांति मिलेगी।

अच्छे लोगों के साथ रहें -

कई बार ऐसा होता है हम कुछ ऐसे लोगों के पास रहते हैं जो हमें सिर्फ बुरी चीजों के बारे में बताते हैं या सीखाते हैं I तो हम इस बात का खास ध्यान देना चाहिए हम किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहना चाहिए जो हमें अच्छी चीजें सिखाए और जिसके साथ वक्त बिता के हमें खुशी मिले I जिसके साथ रहने से हमे अशांति नहीं सिर्फ शांति मिले।

एकांत में रहें -

जब हमे कोई काम करना होता है या मन को शांत करना होता है तो हम इस बात का ध्यान ज़रूर देना चाहिए कि हम ऐसी जगह रहें जहां हमारा मन भटकाने वाला और हम अशांति की तरफ लेे जाने वाला कोई ना हो। हम एकांत में खुद के साथ को वक्त बिताएंगे हमें उसमे शांति मिलेगी और हमारे मन को भी शांति मिलेगी।

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मन पर विजय प्राप्त करने के लिए कुछ खास उपाय-

आपको अपने मन से विजय प्राप्त करने के लिए मन का कहना नहीं जबकि वह करना होगा जो उचित हो, उसे केन्द्रित कर के विजय प्राप्त करें।

मन को अपनी मनमानी नहीं करने दें जबकि उसे कुछ नियमों से बांधे जो आपके लिए अच्छा है उसे ही करें I यदि आप हमेशा अपने मन की सुनेंगे तो यह सही नहीं है।

मन को शांत रखें तथा हमेशा खुद को यह एहसास दिलाएं कि कुछ भी हो हम हमारा मन सबसे बेहतर है खुद को कुछ अच्छी आदतों में अच्छे नियमों में इस प्रकार बांध लें कि हमारा मन हमारे मुताबिक ही रहे।

यदि मन किसी गलत राह पर चल रहा हो तो उसे उस तरफ से हटा के सही तरफ लाने की कोशिश करते रहें।

मन को भटकने से बचाने के लिए मन की भावनाओं को महसूस करें और फिर उसपर कुछ ऐसा करने को सोचे जिससे आपके मन को भी शांति मिले और वह भटके भी नहीं।

मन के मुताबिक कार्य करना सही भी है और गलत भी पर कई बार ऐसा होता है कि हम खुद के मन पर कुछ ज्यादा निर्भर हो जाते हैं और उसी के मुताबिक कार्य करने लगते हैं I ऐसा करके मन हमसे जीत जाता है, पर आप सोचें कि मन आपसे बड़ा है या आपको अपने मन से विजय होना चाहिए। इसलिए कोई भी कार्य जो अनावश्यक हो किन्तु आपका मन उसे करने के लिए उत्साहित हो तो उस जगह आपको खुद के मन को कंट्रोल करने की अधिक आवश्यकता होती है I तब आपको अपने मन से बढ़कर बनना चाहिए और विजय प्राप्त कर लेना चाहिए।

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मन को केन्द्रित करने के लिए बहुत सारे तरीके हैं आइए कुछ तरीके आपसे शेयर करते हैं -

यदि आप अपनी सांस पर संयम कर सकते है तो आप अपने ध्यान पर भी नियंत्रण पा सकते हैं। योगासन कीजिए यदि आप रोज़ योग करने लगेंगे तो आपका आपके मन पर नियंत्रण बढ़ने लगेगा। जब कोई चीज़ किसी व्यक्ति को पसंद हो तो ध्यान अपने आप वहीं जाता है पर ना हो तो नहीं। लोभ और चिंता भी मन को केन्द्रित करने में बहुत सहायक होता है।

आज के युग में तनाव, भाग दौड़ और काम के कारण हम अपने मन को केन्द्रित नहीं कर पाते I किन्तु यह बहुत आवश्यक होता है यदि आपको मन के एकाग्रता को बढ़ाना है तो चारो ओर के शोर को कम करने का प्रयास करें I यदि बाहर से शोर आ रहा तो आप अपने कमरे का दरवाज़ा और खिड़की बन्द कर लीजिए और मन को एकाग्र कीजिए।

रोशनी की ओर देखें -

रोशनी की तरफ देखते हुए कुछ अच्छा सा सोचे जिससे आपके मन को कुछ अच्छा सा संदेश मिले जैसे कि अंधेरा कितना भी गहरा ना हो रोशनी उसे हरा कर उजाला ला ही देती है।

कार्य की सीमा रेखा तय करें -

अपने कार्य की सीमा तय करें और उसके अंदर कार्य करें। और पूरी कोशिश करें कि उस कार्य के लिए आपका मन उसी पर केन्द्रित हो।

उल्टी गिनती गिने -

उल्टी गिनती गिनने से आपको लक्ष्य तक पहुंचने वाले रास्तों के बारे में पता चलेगा।

अच्छी और शांत जगह चुने -

अच्छी और शांत जगह में रहें वहीं कार्य करें जिससे आपका मन कहीं और ना हो के एक जगह ही रहे।

अपने किसी मनपसंद चीज पर अपने दिमाग को केंद्रित करें -

जो चीज आपको पसंद हो और वह आपके लिए अच्छी भी हो उस ओर अपना मन लगाएं।