सहनशीलता से क्रोध पर विजय पाएँ

सहनशीलता से क्रोध पर विजय पाएँ

  

मित्रों, आज का लेख बहुत विशेष है। आज के लेख में हम और आप मिलकर अपने व्यक्तित्व में कुछ सकारात्मक सुधार लाने का प्रयास करेंगे। लेकिन इससे पहले हमारे पास कुछ सवाल हैं जिन्हें आपको पढ़ना चाहिए।

मित्रों, क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि आप बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं?

या फिर आप किसी के द्वारा कहे गए कड़वे शब्दों को सहन नहीं कर पाते ?

या अपनी आलोचना होती देख आप क्रोध से भर जाते हैं?

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आप में से कई लोग ऐसे होंगे जिनका इन प्रश्नों से सरोकार होगा। क्योंकि हममें से कई इस परिस्थिति से दो-चार होते रहते हैं और इन असामान्य परिस्थितियों में अक्सर अपना आपा खो देते हैं।

लेकिन बाद में हमें यह एहसास होता है कि इस उत्तेजना, क्रोध, कोप का परिणाम सदैव दुखदाई ही होता है। क्रोध के कारण हम अपने किसी प्रिय जन को या फिर स्वयं को ही दुख पहुंचा बैठते हैं।

जोश में आकर की गई अपनी इन प्रतिक्रियाओं पर पछतावा करने के क्रम में हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इस स्थिति का कारण हमारा बढ़ता हुआ क्रोध है। किंतु आज आपको एक और पहलू पर विचार करना चाहिए। आपको यह सोचना चाहिए कि आखिर इस बढ़ते हुए क्रोध का कारण क्या है?

मित्रों क्रोध की अधिकता का कारण है एक हमारे अंदर एक विशिष्ट गुण की कमी, और वह गुण है सहनशीलता। जब हमारे अंदर सहनशीलता में कमी आती है तब हमारा क्रोध स्वतः ही बढ़ जाता है। अतः इस क्रोध को पराजित करने का उपाय है - सहनशीलता को बढ़ाना।

आज की चर्चा का विषय यही है कि सहनशीलता को हथियार बना कर क्रोध रूपी शत्रु को कैसे हराया जाए। दोस्तों इससे पहले कि हम चर्चा में आगे बढ़े और विस्तार में बात करें, आइए समझते हैं आखिर सहनशीलता होती क्या है!

क्या है सहनशीलता?

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मित्रों सहनशीलता, जिसे हम सहनशक्ति अथवा सहिष्णुता के नाम से भी जानते हैं, वह ऐसा गुण है जिससे व्यक्ति अपनी अनुकूलता एवं प्रतिकूलता, दोनों को सहन कर पाता है।

मित्रों सहिष्णुता के मायने बहुत वृहत् हैं। इसकी कुछ शब्दों में व्याख्या कर पाना बहुत कठिन है। आज की चर्चा के प्रकरण में कहें तो सहनशीलता हमें आलोचना, निंदा, अपमान, घृणा, इर्ष्या, एवं हर अन्य प्रकार की बुरी भावनाओं के प्रति अनुचित प्रतिक्रिया करने से बचाती है और इन्हें सहज एवं सहर्ष रूप से स्वीकार करने की शक्ति प्रदान करती है।

यही वह गुण है जो व्यक्ति को क्रोध से उत्पन्न झगड़े और कलह में पड़ने से बचा लेता है। यह तो थी सहनशीलता की व्याख्या। आइए अब जानें कि क्रोध को कम करने में सहनशीलता की क्या भूमिका है।

मित्रों आपने समुद्र के किनारे बैठकर समुद्र की लहरों को अठखेलियां करते तो अवश्य देखा होगा। आपने यह भी देखा होगा कि कभी-कभी यह लहरें अनियंत्रित हो विकराल रूप धारण कर लेती हैं। किंतु जब यह किनारे के चट्टानों से टकराती हैं, तब इनका वेग और निरंकुशता दोनों शांत हो कर वापस लौट जाते हैं।

क्रोध भी कुछ इसी प्रकार का है। जब यह अनियंत्रित हो जाता है, तो समुद्र में उठ रही लहरों की भांति ही विकराल रूप धारण कर लेता है।

अब क्रोध रूपी लहरों को रोकने एवं शांत करने के लिए जिस चट्टान की आवश्यकता है, वह चट्टान सहनशीलता ही तो है। सहनशीलता रूपी चट्टान से टकरा कर क्रोध की निरंकुश लहरें भी शांत हो जाती हैं और व्यक्ति इसके विनाश कारी परिणामों से बच जाता है। इसीलिए यदि आप अपने क्रोध को नियंत्रित रखना चाहते हैं तो आपको सहनशीलता रूपी चट्टान को विकसित करना होगा।

अब आप कहेंगे कि यह कहना तो बड़ा आसान है किंतु यह करना और इसे जीवन में उतारना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि जब व्यक्ति क्रोध के प्रभाव में आ जाता है तब उसे यह बातें याद नहीं रह जाती।

इस पर हम आपसे यह कहना चाहते हैं कि बेशक! उत्तेजित व्यक्ति अपने आपे में नहीं रहता और इस स्थिति में सहनशीलता का पालन करना उसके लिए कठिन हो जाता है। किंतु मित्रों, याद करें, कोई भी कार्य एक ही प्रयास में सफल नहीं होता।

हमें आदतों एवं गुणों को विकसित करने के लिए कई दिनों का समय एवं अनगिनत प्रयास करने होते हैं।

कहते हैं ना-

" करत करत अभ्यास ते जनमत होत सुजान।"

सहनशीलता का गुण भी हमारे अंदर तभी पूरी तरह विकसित होगा जब हम इसका अभ्यास करेंगे। शुरुआती दिनों में आपको तकलीफ का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन धीरे-धीरे दृढ़ निश्चय से बढ़ाए गए कदम आपको सफलता की ओर जरूर लेकर जाएंगे।

तो अब बात आती है कि अभ्यास से सहनशीलता का गुण अपने अंदर कैसे विकसित करें। इसका जवाब हम कुछ बिंदुओं के रूप में लेकर आए हैं, जो आपको यह बताएंगे कि आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में किस प्रकार सहनशीलता को धीरे-धीरे शामिल कर सकते हैं।

इसके लिए आपको कुछ छोटे-छोटे उपाय करने होंगे। घबराइये नहीं! यह सभी उपाय काफी सरल किंतु अति प्रभावशाली है। तो देर किस बात की? आइए जानते हैं।

सहनशीलता विकसित करने के तरीके :

✴ दूसरों की भावनाएं एवं परिस्थितियों को समझें :

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मित्रों, सहनशीलता का गुण अपने साथ दया, प्रेम, सद्भावना, समझ, सहानूभूति जैसे गुणों को भी विकसित करता है। अक्सर हम अपनी सहनशीलता तब खो देते हैं जब दूसरों द्वारा कठोर वचन, अपमान, निंदा, आलोचना आदि की जाए।

ऐसी परिस्थितियों में हम सामने वाले के बुरे शब्दों को सुनकर आहत हो जाते हैं और गुस्से में प्रतिक्रिया कर बैठते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि आप इन शब्दों को सहन करने की क्षमता विकसित करें। यह करने के लिए आपको कठोर वचन सुनकर गुस्से का घूँट पी कर नहीं रहना है, और न ही इसे मन में दबाना है। इसके स्थान पर आप समझने का प्रयास करें कि सामने वाला किन परिस्थितियों में ऐसा व्यवहार कर रहा है।

हो सकता है वह किसी विकट परिस्तिथि का सामना कर रहा हो और हालातों से बहुत परेशान हो। खुद को दूसरों की जगह पर रखें, और फिर सोचें कि यदि आप उनके स्थान पर होते और आपकी परिस्थिति ऐसी होती तो शायद आप भी इसी प्रकार प्रतिक्रिया करते।

जब आप इस नजरिए से सोचना शुरु करेंगे तब आप दूसरों की स्थिति को कही बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और उनके कड़वे वचन से आहत ना होकर उनकी परेशानी को सुलझाने का प्रयास करेंगे।

ऐसे में आपको 2 तरह से फायदा होगा। एक यह कि आप में सहन करने की शक्ति का विकास होगा और दूसरा आपके संबंध और अधिक मधुर होंगे।

✴ दूसरों से अपेक्षा ना रखें :

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इस बिंदु की चर्चा का प्रारंभ उदाहरण से करते हैं। मान लेते हैं कि आपके किसी मित्र ने कुछ ऐसा किया जिसकी आपको अपेक्षा नहीं थी। मान लेते हैं कि आपके परम मित्र होने के बावजूद भी उसने आप से अधिक महत्व किसी और व्यक्ति को दिया।

उसके द्वारा किया गया कृत्य आपकी भावनाओं को आहत करता है और आप दुखी अथवा क्रोधित हो जाते हैं। सामान्यतः लोगों की यही प्रतिक्रिया होगी। किंतु एक ऐसा व्यक्ति जो बहुत धैर्यवान एवं सहनशील है, वह इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं करता। दुखी, कुंठित अथवा उत्तेजित होने के स्थान पर वह बहुत सामान्य एवं शांत रहता है।

इसके पीछे कारण यह है कि वह अपने मित्र से किसी भी प्रकार की अपेक्षाएं नहीं रखता। अपेक्षाओं का परिणाम अक्सर दुख ही होता है। इसीलिए यह कहा जाता है कि हमें किसी से अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए क्योंकि जब वह अपेक्षाएं पूरी नहीं होती है तब हमें कष्ट होता है।

इस परिस्थिति में हमारा मन व्याकुल होता है और हम सहनशीलता खोने लगते हैं। इसीलिए आप भी लोगों से बहुत कम अपेक्षाएं रखें जिनके कारण आप पर कोई प्रतिकूल प्रभाव ना पड़े और आप सामान्य रहें।

✴ कम और सोच समझ कर बोलें :

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नापतोल कर बोलना एक सहनशील व्यक्ति की पहचान होती है। सहनशीलता आपको गंभीर रहना सिखाती है। अधिक बोलने वाला व्यक्ति अक्सर वेग में आकर कई ऐसी बातें बोल जाता है, जो उसे नहीं बोलनी चाहिए।

आपने कई ऐसे लोगों को देखा होगा जो तुरंत ही झगड़े में कूद पड़ते हैं और दुनिया भर की बातें बोल जाते हैं। उनका ऐसा करना यह दर्शाता है कि उनमें सहिष्णुता की बहुत कमी है।

सहनशील बनने के लिए आपको अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना होगा। कुछ भी बोलने से पहले अच्छे से सोच-विचार लें कि आपके मुंह से निकले हुए शब्दों का क्या परिणाम होगा।

यदि आपने अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रखा तो संभावनाएं है कि आप जल्दी ही उत्तेजित हो जाएंगे और धैर्य खो बैठेंगे। इसीलिए सहनशीलता विकसित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि आप बहुत सोच समझ कर ही बोले।

✴ विचारों की असमानता को स्वीकार करें :

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मित्रों इस दुनिया में हर व्यक्ति अपने आप में अनोखा और अलग है। इसी प्रकार हर व्यक्ति की मानसिकता एवं विचार भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

कई बार ऐसा होता है कि किसी और के विचारों या सोच से हम सहमत नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में हम यह चाहने लगते हैं कि सामने वाला भी हमारी ही तरह सोचें और उसके विचार हमारी ही भांति हो क्योंकि हम विचारों की इस भिन्नता को स्वीकार नहीं कर पाते हैं।

यह भिन्नता अक्सर मन भेद का कारण बनती है और यह मन भेद अक्सर उत्तेजना एवं क्रोध पैदा करता है। इसीलिए आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि विचारों का मेल न खाना सामान्य बात है।

हर व्यक्ति के अपने विचार होते हैं और वह उस पर दृढ़ होता है। आप अपने विचार दूसरों पर नहीं थोप सकते। इसीलिए आपको अब अपनी मानसिकता को वृहद बनाना होगा और अलग-अलग विचारों को स्वीकार करना सीखना होगा। तभी जाकर आप सही मायनों में सहनशील बन पाएंगे।

✴ ध्यान है आवश्यक :

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मित्रों, राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने कहा था

हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही बनते हैं।

यह बात शत प्रतिशत सही है। केवल सहनशीलता ही नहीं, बल्कि अपने अंदर कोई भी बदलाव लाने के लिए आपको मानसिक रूप से उस बदलाव के विचार को नियमित रूप से ग्रहण करते रहना होगा।

इसके लिए खुद को शांत करें और ध्यान करें। सोचे कि आप सहनशील बनना चाहते हैं, आप सहनशील हैं। कल्पना करें कि हर असामान्य परिस्तिथि का आप बेहद शांति से सामना करेंगे। नियमित रूप से इन विचारों को अपने मन में स्थान दें। धीरे-धीरे यह विचार आप की वास्तविकता बन जाएंगे।

✴ प्रतिक्रिया करने से बचें :

मित्रों, जो व्यक्ति सहनशील होता है वह जल्दी किसी बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता। वह ठीक प्रकार से सोच समझ लेने के बाद ही कुछ कहता या करता है।

आपको भी यही सीखना है। तुरंत किसी बात पर प्रतिक्रिया कर देने से हमें उससे बात की गंभीरता का अवलोकन करने का समय नहीं मिलता। किसी ने हमसे कुछ कहा, और हमने तुरंत प्रतिक्रिया कर दी। हमने यह नहीं सोचा कि वह बात किन परिस्थितियों में बोली गई है, उसका सही अर्थ क्या है, इत्यादि।

इस प्रतिक्रिया का परिणाम यह होता है कि हम उत्तेजित हो सकते हैं। आपको यह करने से बचना होगा। सहनशीलता विकसित करने के लिए आपको किसी प्रकार की प्रतिक्रिया करने से पहले किसी भी बात पर बहुत अच्छे से विचार करना होगा।

फिर आपको यह सोचना होगा कि क्या इस बात पर इस समय प्रतिक्रिया करना उचित है? यदि बात चुप रहकर संभाली जा सकती है तो आप चुप रहना ही उचित समझे। इस प्रकार आप अचानक आवेश में की गई प्रतिक्रिया देने से बचेंगे और सहिष्णु बनेंगे।

निष्कर्ष :

तो प्रिय मित्रों, यह थे कुछ उपाय जिनके द्वारा आप अपने अंदर सहनशीलता के गुणों को विकसित कर सकते हैं और इस गुण द्वारा क्रोध को कम कर सकते हैं। मित्रों, क्रोध हमारे तन और मन दोनों का शत्रु है। वहीं दूसरी ओर सहनशीलता हमारी परम मित्र की तरह है। इसीलिए आज ही क्रोध का दामन छोड़ सहनशीलता से मित्रता करें।

यह गुण न केवल आपके संबंधों को सुधारेगा, बल्कि यह आपको शारीरिक एवं मानसिक शांति भी प्राप्त कराएगा। सहनशीलता के इस गुण का अपने जीवन में स्वागत करने से आप एक बेहतर व्यक्तित्व के स्वामी बन पाएंगे। यही नहीं, सहनशीलता का यह गुण आपको मानवता का उत्कृष्ट उदाहरण बना सकता है। इसीलिए हमारे बताए गए उपायों को अवश्य अपनाएं।

यदि आपके पास कुछ सुझाव हैं, तो अपनी राय अवश्य पोस्ट करें। आपके द्वारा साझा किए गए विचारों से उन सभी लोगों में एक सकारात्मक बदलाव आएगा जो इस लेख को पढ़ेंगे। आशा है कि आपको आज का यह लेख बहुत पसंद आया होगा।


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