संत रविदास द्वारा रचित मार्गदर्शक दोहे

संत रविदास द्वारा रचित मार्गदर्शक दोहे



रैदास को भला कौन नहीं जानता ? रैदास के नाम से प्रसिद्ध संत रविदास भारत के उन महापुरुषों में से एक हैं जिन्होंने अपने ज्ञान से पूरी मानव जाति को प्रकाशित किया। संत रविदास को भारत के अलग-अलग कोनों में अनगिनत नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इन्हें रोहिदास कहते हैं, तो कुछ रैदास, कोई रूईदास कहता है, तो कोई रोहिदास कह कर संबोधित करता है।

हर वर्ष हम भारतीय माघ पूर्णिमा को रविदास जी की जयंती मनाते हैं। कहा जाता है कि इनका जन्म काशी में संवत 1433 में हुआ था। पिता का नाम रघु दास एवं माता का नाम कर्मा था। रविदास जी कथित नीची जाति में जन्मे थे किंतु उन्होंने जातिवाद की इस प्रथा से खुद को कभी प्रभावित नहीं होने दिया और वह बड़ी खुशी से अपने पिता की ही भांति जूतों की मरम्मत का व्यवसाय करते थे।

स्वभाव से दयालु एवं परोपकारी रविदास को साधु-संतों की संगति बहुत भाती थी। स्वामी रामानंद की छत्रछाया में रहकर उन्होंने व्यवहारिक एवं दर्शन ज्ञान प्राप्त किया। मित्रों, रविदास जी के लिए संत, दार्शनिक, कवि, समाज सुधारक, आदि उपाधियां भी कम ही है। उन्होंने अपनी रचनाओं से न केवल हिंदी साहित्य को धन्य किया है, अपितु उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा समाज में प्रचलित कुरीतियों का खंडन किया है और सब को मानवता की सीख दी है।

रविदास जी द्वारा कही गयी एक पंक्ति लोकप्रिय है -

"मन चंगा तो कठौती में गंगा "

इसका आशय यह है कि यदि व्यक्ति के मन में सच्ची श्रद्धा हो, यदि मन पूर्णतः पवित्र हो, तो चेहरा धोने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कठौती में भी स्वयं माता गंगा प्रकट हो जाती हैं। आज हम संत रविदास जी द्वारा रचे गए कुछ ऐसे ही दोहे लेकर आए आए हैं जो समाज में फैली कुरीतियां एवं अंधविश्वास का खंडन करती हैं। आइए जानें :

1 ) रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पीपीलिका हवै चुनि खावै।।

रविदास जी ने मनुष्य को सदैव सद्गुणों का विकास करने की सीख दी है। ईश्वर की सच्ची भक्ति के लिए विनम्रता, दया, परोपकार, परमार्थ, शिष्टाचार आद गुणों का विकास अत्यंत आवश्यक है। प्रस्तुत दोहे के माध्यम से उन्होंने यही बताया है कि मन में अहंकार रखकर ईश्वर की भक्ति नहीं की जा सकती है। दोहे की प्रथम पंक्ति का आशय यह है कि :

हे मनुष्य ! यह भक्ति बड़ी दुर्लभ है। ईश्वर की भक्ति उसे ही प्राप्त होती है, जिसका भाग्य अच्छा होता है अर्थात भक्ति बड़े भाग्य से मिलती है। अतः इसे पाने के लिए अभिमान का त्याग करो तभी सफल हो सकते हो। जिस प्रकार हाथी अथाह शक्ति एवं विशाल काया का स्वामी है किंतु वह धरती पर पड़े चीनी (शक्कर) के दानों को चुनने में असक्षम है, जबकि सूक्ष्म लघु शरीर वाली पीपली का यानी कि चींटी इन शक्कर के कणों को बड़ी ही सरलता से चुनकर खा लेती है।

ईश्वर की भक्ति भी ऐसी ही है। जिस प्रकार हाथी अपनी विशाल काया के रहते शक्कर नहीं चुन सकता, उसी प्रकार मनुष्य अभिमान रखकर भक्ति नहीं कर सकता। अहंकार का त्याग कर विनम्रता का आलिंगन करने वाला व्यक्ति ईश्वर का भक्त बन सकता है।

2 ) रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछो करम की कीच ।।

रविदास जी ने अपनी रचनाओं में समाज में प्रचलित कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया है। मनुष्य ने संप्रदाय, जाति, वर्ण, कुल को व्यक्ति की श्रेष्ठता का पैमाना बना दिया है, जिसका रविदास ने कराई से विरोध से किया है। जन्म लेना मनुष्य के हाथों में नहीं है। इसीलिए इससे उसकी विद्वता का आकलन नहीं होता। संत रविदास खुद बहुत ही नीची जाति में जन्मे थे, लेकिन उनमें ऐसे ज्ञान का भंडार था जिसके कारण पूरी दुनिया उन्हें नमन करती है।

जाति की इस प्रथा का खंडन करते हुए दोहे में रविदास जी कहते हैं कि जन्म के कारण कोई नीच नहीं होता। अर्थात किसी जाति विशेष में जन्म लेने के कारण किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता तय नहीं होती। व्यक्ति को ऊंचा या नीचा बनाने वाली जाति, वर्ण या मूल नहीं बल्कि कर्म होते हैं। यदि कर्म निम्न हो तो ऊंची जाति का व्यक्ति भी नीच ही कहलाएगा, किंतु यदि व्यक्ति नीची जाति में जन्मा हो, किंतु उसके कर्म उच्च हो तो वह निश्चय ही ऊंचा (श्रेष्ठ) कहलाएगा।

प्रस्तुत दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि व्यक्ति के गुण, श्रेष्ठता का आकलन हमें उसकी जाति की नहीं बल्कि कर्म के आधार पर करना चाहिए। हमारा ध्यान अपने कर्मों पर केंद्रित होना चाहिए । चाहे हम कितने भी ऊंचे कुल से क्यों ना हो, यदि हमारे कर्म निम्न हुए तो हमारा चरित्र नीचा ही कहलाएगा। अतः सदैव श्रेष्ठ कर्म करें।

3 ) रैदास कनक और कंगन महि, जिमि अंतर कुछ नाहीं।
तैसे ही अंतर नहीं, हिंदुअन तुरकन माहि।।

रविदास जी की रचनाएँ समाज हित की भावना से ओतप्रोत हैं। कबीर, रहीम की भांति ही उन्होंने मानवता को किसी धर्म, जाति, संप्रदाय से ऊपर करके देखा है। धर्म एवं जाति पर अक्सर वाद विवाद एवं मतभेद होते रहते हैं। कोई राम-राम कहता है, तो कोई रहीम कहता है। किंतु रविदास जी ने कहा है कि ईश्वर एक ही है, जिनकी हम अलग-अलग रूपों में पूजा करते हैं। अतः राम, रहीम में कोई फर्क नहीं है। इसी तरह सभी मनुष्य भी एक समान है।

यही समझाते हुए दोहे की प्रथम पंक्ति में रविदास जी ने कहा है कि कनक, अर्थात सोने और कंगन के बीच कुछ अंतर नहीं है, क्योंकि कंगन सोने से ही बना होता है। दोनों केवल रूप एवं आकार में अलग है किंतु दोनों एक ही धातु है। ठीक इसी प्रकार भगवान को पूजने वाले हिंदू, और अल्लाह की बंदगी करने वाले तुर्क, अर्थात मुसलमानों में भी कोई अंतर नहीं है। लोग जिसकी उपासना करते हैं, वही हिंदुओं का परमेश्वर और मुसलमानों का परवरदिगार है।

केवल नाम अलग है किंतु तत्व एक ही है, जो सबका मालिक है। इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म अथवा समुदाय के नाम पर लोगों को अलग समझना हमारी भूल है। ईश्वर एक ही हैं जिसने सभी को जन्म दिया है और सब का कल्याण भी करते हैं।

निष्कर्ष :

तो यह थे संत रविदास द्वारा लिखे गए कुछ बेहतरीन दोहे। आपने गौर किया होगा कि हर दोहा अंत में हमें एक बहुमूल्य सीख देता है। इन दोहों में रविदास जी ने जाति, धर्म एवं संप्रदाय के नाम पर लोगों को बांटने वाली विचारधारा का खंडन किया है, एवं एकता व भाईचारे जैसे संदेशों को प्रेषित किया है। यदि संत रविदास जी के दोहों से सीख ली जाए, तो हम सभी मनुष्य आपसी भेद मिलाकर मिटाकर एक दूसरे से प्यार करने की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। मानवता की रक्षा के लिए यह हमारा सर्वोच्च प्रयास होगा।


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