संतोष करना सिखाते प्रेरणादायक दोहे

संतोष करना सिखाते प्रेरणादायक दोहे



शास्त्रों में कहा गया है - "संतोषम परम सुखम" अर्थात संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष का तात्पर्य है स्वयं के पास जितने संसाधन है उनसे तृप्त रहना I दोस्तों, आजकल सभी अधिक से अधिक धन कमाने पर ध्यान देते हैं। सबको अधिक चाहिए। अधिक पाने की चाह में व्यक्ति दिन रात का सुख चैन गवा देता है, क्योंकि उसके पास जितना होता है वह उससे कभी संतुष्ट नहीं होता।

यहीं पर आवश्यकता आती है संतोष की। मनुष्य धन से धनी नहीं बनता, अपितु मन से धनी बनता है। संतोषी व्यक्ति सदा सुखी रहता है क्योंकि वह किसी के पीछे भागता नहीं है। अतः हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में संतोष के इस सुंदर गुण को स्थान दे सकें। ऐसा करने में हम आपकी मदद करेंगे। आज हम महापुरुषों की वह सीख ले कर आए हैं जो आपको संतोष के महत्व को समझाएंगे और उससे धारण करने की ओर प्रेरित करेंगे। आज के सभी दोहे इसी विषय पर हैं। आइए जानें :

1 ) साईं इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाए ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।।

प्रस्तुत दोहे की रचना महान रहस्यवादी कवि संत कबीर दास जी द्वारा की गई है। उन्होंने मनुष्य को संतोषी होने की सीख दी है। अधिक धन - संपदा, वैभव, ऐश्वर्य का क्या काम? यह विषय वस्तु की माया, लोभ - लालच, दुख एवं चिंताओं को आमंत्रित करती हैं। जीवन यापन के लिए जितना आवश्यक है, कबीर जी ने उतने की इच्छा रखने की सलाह दी है।

इसी संदेश के साथ दोहे की प्रथम पंक्ति में कबीर दास जी भगवान का आह्वान करते हुए उन से विनती करते हैं कि - हे ईश्वर! हे परम ब्रह्म परमेश्वर! मुझे उतना ही दीजिए जितने में मेरा कुटुंब अर्थात मेरा परिवार भली-भांति समाहित हो जाए, यानी कि मैं अपने एवं अपने परिवार का भली प्रकार से पालन एवं भरण पोषण कर सकूँ।

आगे कवि कहते हैं कि मुझे बस इतनी ही आशा है, कि आप मुझे जितना दे उतने में मेरे साथ-साथ घर आए संत - अतिथि का भी पेट भर जाए।

2 ) गोधन, गज धन, वाजि धन, रतन धन खान।
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरी समान।।

हीरे, मोती, संपत्ति, धन, पशु इनमें से सबसे बड़ा धन क्या है? धन तो वह होता है, जो व्यक्ति को सुख, शांति व ऐश्वर्य दे, किंतु इन पशुधन, रत्न इत्यादि के उपलब्ध हो जाने पर भी मनुष्य सुखी नहीं रहता। क्योंकि उसे जितना अधिक प्राप्त होता है वह उतना ही अधिक धन पाने की चाह रखने लगता है। यह इच्छाएं बढ़ती ही जाती है और मनुष्य सदैव असंतुष्ट रह जाता है।

इसीलिए यह सब धन वास्तव में धन नहीं है। असली धन है संतोष। क्योंकि जब व्यक्ति के मन में संतोष आ जाता है तब उसे कुछ भी अधिक पाने की चाह नहीं होती। प्रस्तुत दोहे में कवि ने यही संदेश दिया है। कबीर दास जी द्वारा रचित इस दोहे में कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनके अर्थ इस प्रकार हैं -

गोधन का अर्थ है गाय। गज धन का अर्थ है जमीन रूपी धन और वाजी धन का का तात्पर्य संपत्ति समझे जाने वाले घोड़े से है। कवि कहते हैं कि पशुधन अर्थात गाय, घोड़े एवं बहुमूल्य मणि मानिक, यह सब एक पर एक उत्कृष्ट धन माने जाते हैं। जिसके पास यह सब हो, वह धनाढ्य कहलाता है एवं सामान्य जन इसकी कामना रखते हैं।

किंतु इन सभी धनों से बड़ा धन है संतोष धन। जब व्यक्ति के मन में संतोष विद्यमान हो जाता है तब समस्त मणि - मानिक, पशु धन, संपत्ति इत्यादि धूरी, अर्थात धूल के समान लगने लगते हैं। इन सभी का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अतः संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

प्रस्तुत दोहे से हमें यह संदेश मिलता है कि पैसे के पीछे भागने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि इससे हमें सुख एवं शांति नहीं मिलेगी। यदि सबसे बड़ा धन चाहिए, तो मन में संतोष स्थापित करना चाहिए।

3 ) क्षमा समान न तप, सुख नहीं संतोष समान।
तृष्णा समान नहीं व्याधि कोई, धर्म न दया समान।।

प्रस्तुत दोहे में कविवर ने मानव के श्रेष्ठ गुणों का वर्णन किया है। उन्होंने मनुष्य को क्षमाशील, संतोषी, दयावान बनने के लिए प्रेरित किया है एवं महत्वाकांक्षा का त्याग करने का उपदेश दिया है। वह कहते हैं कि क्षमा के समान कोई तपस्या नहीं है। संतोष के समान कोई धन नहीं है, तृष्णा के समान कोई व्याधि अर्थात रोग नहीं है, एवं दया के समान कोई धर्म नहीं है।

आइये इन सभी गुणों की व्याख्या करें :

क्षमा करना बहुत कठिन है। किसी के द्वारा दी गयी पीड़ा, हानि एवं विश्वासघात को भुलाकर व्यक्ति को सच्चे मन से अपना लेना बहुत कठिन है। इसके लिए आत्म संयम एवं धैर्य की पराकाष्ठा चाहिए। इसलिए क्षमा को तपस्या के समान कठिन बताया गया है। फिर कवि ने संतोष को सबसे बड़े सुख की उपमा दी है।

क्योंकि व्यक्ति के दुख का कारण उसकी महत्वाकांक्षा ही होती हैं। धन, संपदा, संबंध इत्यादि ही उसे सुखी बनाते हैं किंतु यदि यहां इच्छाएं अधूरी रह जाए तो व्यक्ति दुख के सागर में डूब जाता है। संतोष वह स्थिति है जहां व्यक्ति के पास जितना हो वह उसी में सुखी रहता है। उसे अन्य किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती है। अतः संतोषी मन में ही परमसुख का वास होता है।

कवि ने तृष्णा को सबसे बड़ा रोग बताया है क्योंकि अन्य रोग शरीर के अंगों को प्रभावित करते हैं किंतु लोभ लालच आदि व्यक्ति के मन एवं विचारों को पूर्णतः रोग ग्रस्त कर देते हैं। मनुष्य छल कपट में पढ़कर मानसिक रूप से सदैव अशांत बना रहता है। इसीलिए लालच मनुष्य का सबसे बड़ा रोग है।

अंत में कवि दया को सबसे बड़े धर्म का स्थान देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि संसार के सभी धर्म मानव को सभी प्राणियों से प्रेम करने की शिक्षा देते हैं। जिस व्यक्ति के मन में दया भाव हो, वह हर प्राणी के प्रति करुणा, प्रेम एवं सद्भाव रखता है। यही सभी धर्मों का सार है। अतः दया सबसे महान धर्म है।

4 ) दया नम्रता दीनता, छिमा सील संतोष।
इन कहँ लै सुमिरन करे, निहचै पावै मोख।।

यह दोहा चरण दास जी द्वारा रचा गया है। उन्होंने दया, विनम्रता, दीनता, क्षमा, धैर्य एवं संतोष को मानव के सबसे बड़े गुण बताया है। इन सब गुणों से रहित मानव पशु के समान है एवं उसका जीवन व्यर्थ है।

दोहे में कवि का कहना है कि जिस मनुष्य में दूसरों के प्रति दया, वाणी एवं अचार में सहज विनम्रता, दीनता अर्थात अपनी संपत्ति को परोपकार में लगाकर कम संसाधनों में जीवन व्यतीत करने की भावना हो, क्षमाशीलता, यानी कि बड़े से बड़े अपराध को भी क्षमा करने की शक्ति हो, जो हर परिस्थिति में धैर्य धारण करे एवं मन में संतोष रखे, वह व्यक्ति मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। जो मानव इन सभी गुणों का सुमिरन एवं आचरण करता है, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है।

5) चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशाह ।।

जिस व्यक्ति को कुछ पाने की इच्छा है, वह उसे प्राप्त कर पाएगा या नहीं, इस बात से चिंतित रहता है, जब उसे वह मिल जाता है तो उसे खोने का भय होता है । किंतु जिसे कुछ भी पाने की इच्छा शेष नहीं है, वह इन सब से मुक्त है। यही संदेश देते हुए कवि प्रस्तुत दोहे में कहते हैं कि जिस से कुछ पाने की इच्छा नहीं है, अर्थात जिसके मन से लोभ, मोह, माया खत्म हो गई है, जिसे कुछ खोने की चिंता नहीं है, जिसका मन अतीत, वर्तमान एवं भविष्य को लेकर बिल्कुल बेपरवाह है, वही इस दुनिया का सबसे बड़ा राजा है।

कवि ने उस व्यक्ति को राजा की उपाधि दी है क्योंकि राजा के पास दुनिया भर की संपत्ति, ऐश्वर्य होते हैं फिर भी वह चिंताओं के कारण सुखी नहीं रह पाता । किंतु वह जिससे न तो कोई चाह है ना ही कोई चिंता, वह राजा से भी अधिक सुखी है। अतः संतोषी व्यक्ति ही सबसे बड़ा धनी है। इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जितना हमारे पास है उसी में संतोष करना चाहिए। तभी जाकर हम परम सुख का अनुभव कर सकेंगे।

निष्कर्ष :

पाठकों आपने देखा कि महापुरुषों ने संतोष करने पर कितना जोर दिया है। संतोष पाकर मन को जितना खुश सुख मिलता है उतना सुख शायद ही संसार की किसी अन्य वस्तु को पा लेने से मिलता होगा। इसीलिए तो कवियों ने संतोषी व्यक्ति को दुनिया के सबसे बड़े राजा तक की उपाधि दे डाली। संतोष शब्द बहुत छोटा है किंतु इसका अर्थ एवं महत्व बहुत बड़ा है। हमें इस महत्व को समझने की आवश्यकता है ताकि हम भी संतोशी बन पाए और अपने जीवन को सुख एवं शांति से परिपूर्ण कर दें।


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