विद्या पर आधारित श्लोक व उनके अर्थ

विद्या पर आधारित श्लोक व उनके अर्थ



मित्रों, इस लेख को पढ़ने वाले हमारे कई सारे पाठकों में से कुछ विद्यार्थी होंगे, कुछ अपनी शिक्षा पूरी कर चुके होंगे, अथवा कुछ नए कौशलों को सीखना चाहते होंगे। मित्रों, विद्या का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन यापन के लिए मनुष्य को कुछ कौशलों की आवश्यकता होती है, जिनका उपयोग कर वह अपनी आजीविका की व्यवस्था कर सके।

यह कौशल विद्या से ही प्राप्त होते हैं। विद्या द्वारा अर्जित किए गए ज्ञान का उपयोग कर ही व्यक्ति अपनी जीविकोपार्जन करता है। एक अशिक्षित व्यक्ति को अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसे पढने, गिनती करने, लिखने, अथवा लिखी हुई चीजों को समझने में बहुत कठिनाई होती है। साथ ही, कौशलों के अभाव में उसे आजीविका के साधन भी उपलब्ध नहीं होते।

इसीलिए जन्म लेने के बाद बच्चे के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता उसकी विद्या प्राप्ति को बनाया जाता है। मित्रों, विद्या प्राप्ति केवल जीविका के साधन जुटाने के लिए यह आवश्यक नहीं है, और न ही यह केवल किताबी ज्ञान देती है, बल्कि विद्या मनुष्य के समुचित विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। विद्या के माध्यम से ही व्यक्ति को जीवन के उद्देश्य, अपने कर्तव्य, धर्म, मानवता, व्यवहारिक ज्ञान का भी बोध होता है।

विद्या द्वारा ही मनुष्य अनुशासन, आचरण, व्यवहार इत्यादि के बारे में जान पाता है। जीवन में क्या सही और क्या गलत है, इसका बोध भी विद्या प्राप्ति से ही होता है। इसी कारण वश रचनाकारों एवं महान पुरुषों ने सदैव से ही विद्या का स्थान जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बताया है। इसी कड़ी में हम आपके लिए संस्कृत भाषा में लिखे कुछ श्लोक लेकर आए हैं जो बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में विद्या कितनी महत्वपूर्ण है :

1) सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतः सुखम् ।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम् ॥

प्रस्तुत श्लोक में यह बताया गया है कि विद्या प्राप्ति का मार्ग सुगम नहीं है। श्लोक की पहली पंक्ति के अनुसार सुख की अभिलाषा रखने वाले को विद्या कहां से मिले, एवं विद्या की कामना रखने वाले को सुख भला कैसे प्राप्त हो?

सुखार्थी, अर्थात सुख चाहने वाले को विद्या त्याग देनी चाहिए एवं विद्या प्राप्त करने की इच्छा रखने वालों को सुख का परित्याग कर देना चाहिए। सुख की इच्छा रखने वाले व्यक्ति जीवन में कोई कष्ट नहीं उठाना चाहते, वह कठोर परिश्रम नहीं करना चाहते, एवं आरामदायक जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। किंतु आराम में विद्या कहां ?

विद्या ग्रहण करने के लिए निद्रा, आराम एवं सभी अन्य सुखों का त्याग कर कठोर परिश्रम करना पड़ता है। जो दिन-रात श्रम नहीं करता, उसे विद्या नहीं मिलती। अतः जो वास्तव में विद्या प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सभी सुखों को छोड़ देना चाहिए। सुख एवं विद्या एक साथ नहीं मिल सकते।

इस श्लोक से विद्यार्थियों को यह शिक्षा मिलती है कि विद्यार्थी जीवन में यदि सुख की कामना की जाए, तो विद्या नहीं प्राप्त की जा सकती।
अतः विद्यार्थियों को चाहिए कि वह अपने सभी आराम त्याग कर खुद को केवल अध्ययन में संलग्न करें।

2 ) गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः ।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः।।

प्रस्तुत श्लोक में पाठक के उन गुणों का वर्णन किया गया है, जिनके रहते व्यक्ति उत्तम पाठक नहीं बन सकता। श्लोक में कहा गया है कि पुस्तक में लिखे शब्दों को गा - गा कर पढ़ना, शीघ्रता अर्थात जल्दी - जल्दी पढ़ना, जिसके कारण शब्द स्पष्ट रूप से पता ना चल पाए, पढ़ते हुए सिर हिलाना, केवल लिखा हुआ पढ़ जाना, विषय वस्तु का अर्थ समझे बिना पढ़ना एवं कंठ से धीमी आवाज का निकलना। प्रायः यह सभी एक पाठक के छः दोष हैं।

इस प्रकार पढ़ने से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति उत्तम पाठक बनना चाहता है, तो उसे इन छः दोषों का त्याग करना होगा। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अच्छे पाठक को पढ़ते समय कैसा आचरण करना चाहिए। एक उत्तम पाठक को पढ़ने के समय गाकर नहीं पढ़ना चाहिए। इससे शब्दों के सही अर्थ में परिवर्तन आ जाता है।

शब्दों का उच्चारण एक निश्चित अनुतान में होना चाहिए, अर्थात पढ़ते समय स्वरों के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, शब्दों को आराम से एवं पर्याप्त समय देकर पढ़ना चाहिए, ताकि प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट रूप से सुनाई दे।

पाठक को सही मुद्रा में बैठना चाहिए, जहां शरीर का हर अंग सीधा एवं तना हुआ हो। एक अच्छा पाठक केवल लिखित विषय वस्तु को नहीं पढ़ता, बल्कि यदि लिखित विषय में कुछ त्रुटियां हो तो वह उसे सुधार कर पढता है। अर्थात पाठक की अपने विषय पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए। इसके अलावा पाठक की आवाज तेज़ व स्पष्टता से सुनाई देने वाली होनी चाहिए ताकि सामने बैठे श्रोता हर शब्द को आसानी से समझ सके।

3 ) नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ॥

श्लोक की प्रथम पंक्ति का तात्पर्य है कि विद्या के समान कोई और भाई - बंधु नहीं है। न ही इस संसार में विद्या जैसा कोई मित्र है। श्लोक की दूसरी पंक्ति के अनुसार विद्या समान कोई वित्त अर्थात धन नहीं है, और न ही विद्या प्राप्ति के समानांतर संसार में कोई और सुख है।

अतः प्रस्तुत श्लोक में विद्या को संसार में सभी से श्रेष्ठ बताया गया है। विद्या हर कठिनाई में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है एवं सदैव उसके साथ रहती है, इसीलिए विद्या को बंधु के समान कहा गया है। मित्र की ही भाँति विद्या हर दुख एवं सुख में व्यक्ति का साथ देती है। विद्या ग्रहण करके ही व्यक्ति स्वयं का अवलोकन कर अपने गुण एवं अवगुण को जान पाता है।

साथ ही विपत्ति पर जाने पर अध्ययन से मिला ज्ञान ही व्यक्ति को विकट परिस्थितियों से उबारता है। अतः विद्या ही सबसे बड़ी मित्र है। विद्या के बल पर ही व्यक्ति प्रतिष्ठा, उच्च पद, मान - सम्मान एवं शक्ति पाता है। विद्या होने पर ही धन की प्राप्ति होती है। इसीलिए विद्या ही सर्वश्रेष्ठ धन है ।

विद्या ग्रहण करके मिला ज्ञान व्यक्ति को जीवन के यथार्थ से परिचित कराता है, जिसके कारण वह संतोष जैसे गुणों को सीख पाता है। इन गुणों के ज्ञान के पश्चात व्यक्ति हर परिस्थिति में समान एवं सुखी रहता है। अतः विद्या के समानांतर संसार में और कोई सुख नहीं है। प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विद्या ही मनुष्य के जीवन का आधार है। अतः हमें सदैव स्वयं को विद्या प्राप्ति में संलग्न रखना चाहिए।

4 ) न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

प्रस्तुत दोहे में विद्या की तुलना धन से की गई है और कहा गया है कि विद्या सभी धनों में श्रेष्ठ है। श्लोक की प्रथम पंक्ति कहती है कि विद्या रूपी धन को चोरों द्वारा हरण नहीं किया जा सकता है, अर्थात कोई चोर इसे चुरा नहीं सकता।

न ही यह किसी राजा के द्वारा हरी जा सकती है। अर्थात कोई राजा इसे अपनी शक्ति एवं पद के बल पर जबरन नहीं छीन सकता। संपत्ति की भांति भाइयों में विद्या का कोई भाग नहीं नहीं होता है। अतः इसे किसी के साथ बांटना नहीं पड़ता है, और ना ही विद्या रूपी इस धन का कोई अतिरिक्त भार होता हैI विद्या रूपी यह अनमोल धन खर्च करने से निरंतर और अधिक बढ़ता ही जाता है। अतः विद्याधन सभी धनों में प्रमुख एवं श्रेष्ठ है।

इस श्लोक से हमें यह संदेश मिलता है कि मनुष्य का सबसे बहुमूल्य खजाना उसकी विद्या ही है। यह वह धन है जिसे पा लेने वाला व्यक्ति हर चिंता से मुक्त हो कर हमेशा सुखी रहता है। इससे श्रेष्ठ और इससे बहुमूल्य संसार में और कुछ नहीं है। अतः हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में विद्या का स्थान सर्वोपरि रखें एवं निरंतर विद्या प्राप्ति की दिशा में बढ़ते रहें।

5 ) रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥

प्रस्तुत श्लोक में विद्या के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। श्लोक की पहली पंक्ति के अनुसार, कोई व्यक्ति चाहे कितना भी रूपवान क्यों ना हो, चाहे वह पूर्णतः यौवन से संपन्न हो अथवा कितने ही ऊंचे कुल में पैदा क्यों ना हुआ हो, किंतु यदि वह विद्याहीन है, अर्थात उसे विद्या नहीं प्राप्त हुई है, तब वह रूप, यौवन एवं कुल से परिपूर्ण होने पर भी शोभनीय नहीं रह जाता।

सुंदरता एवं प्रतिष्ठा के सभी मानक उसकी शोभा नहीं बढ़ा पाते। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार केसुड़े का फूल चाहे कितना भी सुंदर व आकर्षक क्यों न हो, किंतु यदि उसमें सुगंध ना हो, तो वह शोभा नहीं देता। केसुड़े के पुष्प का महत्व उसकी सुगंध से होता है, इसी प्रकार व्यक्ति की शोभा उसकी विद्या से होती है, न कि रूप अथवा यौवन से। अतः जीवन में सबसे बड़ी प्राथमिकता विद्या अर्जित करना होनी चाहिए।

6 ) माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।


प्रस्तुत दोहे में यह संदेश प्रतिपादित किया गया है कि बालकों के लिए समुचित शिक्षा कितनी आवश्यक है। श्लोक की प्रथम पंक्ति के अनुसार वह माता अपने बालक की शत्रु के समान है, एवं वह पिता अपनी संतान के बैरी ( दुश्मन ) हैं, जो अपने बालक को नहीं पढ़ाते हैं।

शिक्षा ना मिलने पर वह बालक बड़ा होकर अन्य शिक्षित लोगों की तुलना में अनपढ़ रह जाता है, जिसके कारण उसे सम्मान नहीं मिलता। कवि ने इसकी तुलना हंस एवं बगुले से करते हुए कहा है कि जिस प्रकार सुंदर हंसों के झुंड के मध्य बगुला शोभा नहीं देता, उसी प्रकार बुद्धिमानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पाता।

वह बुद्धिमानों के बीच उपहास का पात्र बन जाता है। अतः बाल्यकाल में शिक्षा प्राप्ति अत्यंत आवश्यक है। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वह अपने संतानों को उचित एवं उच्च शिक्षा प्राप्त करवाएं ताकि उनकी संतान हर प्रकार से योग्य बने ।

7) मातेव रक्षति पितेव हिते नियुंक्ते। कान्तेव चापि रमयत्यपनीय खेदम्।।
लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षु कीर्तिम् I किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या।।

प्रस्तुत श्लोक में व्यक्ति के जीवन में विद्या की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। श्लोक की प्रथम पंक्ति कहती है कि विद्या माता की तरह रक्षा करती है एवं जिस प्रकार पिता अपनी संतानों का भला करते हैं, उसी प्रकार विद्या मनुष्य का हित करती है।

पत्नी के ही समान विद्या सारी थकान मिटा कर मन को रमाती, रिझाती व मनोरंजन करती है। लक्ष्मी की भांति वित्त, अर्थात धन की प्राप्ति कर व्यक्ति शोभा बढ़ाती है और चारों दिशाओं में यश व कीर्ति फैलाती है।

ऐसा क्या है जो विद्या द्वारा सिद्ध नहीं होता ?


सत्य ही है कि यह विद्या कल्पवृक्ष के समान है, जो व्यक्ति के सभी मनोरथों, इच्छाओं व अभिलाषाओं को सिद्ध करती है। प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अपने जीवन में लक्ष्य की प्राप्ति करने का एक मात्र साधन है, और वह है विद्या प्राप्ति। विद्या प्राप्ति द्वारा ही सब कुछ संभव है।

8 ) विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।।


उपर्युक्त श्लोक यह संदेश प्रतिपादित करता है कि किस प्रकार विद्या मनुष्य में विभिन्न गुणों को विकसित करती है। इन गुणों के कारण ही व्यक्ति जीवन में धन, यश, कीर्ति एवं सुख प्राप्त करता है।

श्लोक की प्रथम पंक्ति का आशय है कि विद्या व्यक्ति को विनय, अर्थात विनम्रता देती है। विद्या विहीन मनुष्य में आचार एवं व्यवहार की महिमा का ज्ञान नहीं होता है। यह ज्ञान विद्या द्वारा ही प्राप्त किया जाता है जिससे मनुष्य विनम्र बनता है। विनम्रता उसे पात्रता, अर्थात किसी कार्य को करने की योग्यता प्रदान करती है। इसी योग्यता के बल पर व्यक्ति धन का अर्जन एवं संचय कर पाता है।

इस संचित धन से व्यक्ति दान - धर्म का अपना कर्तव्य निभा कर विभिन्न धार्मिक कर्मकांड, पूजन, यज्ञ, अनुष्ठान आदि करता है एवं धर्म का पालन करने से व्यक्ति को अनंत सुख की प्राप्ति होती है।

अतः प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विद्या ही सभी सुखों की कुंजी है। विद्या रहित मनुष्य में विनम्रता नहीं होती है। ऐसा मनुष्य अयोग्य रह जाता है, जिसके कारण उसे धन की प्राप्ति नहीं होती है। धन के बिना धर्म नहीं होता और धर्म किए बिना व्यक्ति सुखी कैसे रहेगा? अतः मनुष्य को सदा ज्ञानार्जन करना चाहिए।

निष्कर्ष :
तो मित्रों, इन श्लोकों के माध्यम से आपने जाना कि मनुष्य के जीवन में विद्या का स्थान सर्वोपरि है। अतः हमें विद्या को अपने जीवन की प्राथमिकता बनाकर निरंतर ज्ञान प्राप्ति में संलग्न रहना चाहिए।

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