विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक श्लोक व उनके अर्थ

विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक श्लोक व उनके अर्थ



नमस्कार मित्रों!

आज के लेख में हम "विद्यार्थी जीवन" पर चर्चा कर रहे हैं। विद्यार्थी जीवन हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। यही वह चरण है, जहां व्यक्ति के जीवन की दिशा एवं दशा तय होती है।

अतः विद्यार्थी जीवन में ज्ञान अर्जित करने एवं जीवन के आवश्यक मूल्यों को सीखने पर ज़ोर दिया जाता है। ज्ञान प्राप्ति, रीति का ज्ञान, नैतिक मूल्य इत्यादि विद्यार्थी जीवन की प्राथमिकता होते हैं।

क्योंकि यही ज्ञान एवं यही मूल्य आगे जाकर व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं और उन्हें सफल बनाते हैं। इसीलिए यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि विद्यार्थीकाल में व्यक्ति को सही ज्ञान एवं सही मार्गदर्शन प्राप्त हो।

आज का यह लेख मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से भरा हुआ है। इस लेख में हम आपके लिए कुछ ऐसे श्लोक लेकर आए हैं, जिनमें विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश दिए गए हैं।

आज इस लेख को पढ़ने के बाद आप जान पाएंगे कि एक विद्यार्थी को अपने जीवन में कैसा आचरण करना चाहिए। तो आइए श्लोकों पढ़ें व उनके अर्थ को समझें :

1 ) काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥


इस श्लोक का ज्ञान हर विद्यार्थी को अवश्य होना चाहिए। यह श्लोक केवल संस्कृत में लिखी कुछ पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि अपने आप में विद्यार्थियों के लिए एक मार्गदर्शन है।
प्रस्तुत श्लोक में बताया गया है कि एक विद्यार्थी में क्या-क्या गुण होने चाहिए, जिससे उसके जीवन का यह चरण चरितार्थ हो सके।

श्लोक की प्रथम पंक्ति कहती है कि कौवे की भांति सब कुछ जानने की चेष्टा, बगुले की तरह एकाग्रता व ध्यान, कुत्ते की तरह पतली नींद, कम भोजन ग्रहण करना एवं गृह का त्याग, अर्थात घर का त्याग करना, यह एक विद्यार्थी के पांच लक्षण हैं।

आइए श्लोक के भावार्थ को समझें। जिस प्रकार कौवा हर चीज़ जानने की इच्छा एवं जिज्ञासा रखता है, ठीक उसी प्रकार एक विद्यार्थी को भी नित्य कुछ नया जानने और सीखने की चेष्टा करती रहनी चाहिए।

अर्थात, जितना हो सके उतना ज्ञान ग्रहण करते रहना चाहिए। यह विद्यार्थी का पहला लक्षण है।

दूसरे लक्षण की बात करें तो यह कहा गया है कि विद्यार्थी को बगुले का अनुसरण करना चाहिए। बगुले में असीम एकाग्रता एवं ध्यान होता है। बगुले की तरह विद्यार्थी को भी हर कार्य एकाग्र चित्त होकर करना चाहिए। विद्यार्थी का मन और मस्तिष्क सदैव एकाग्र रहना चाहिए और उसका ध्यान केवल अपने लक्ष्य पर टिका रहना चाहिए। ताकि वह जो भी करे वह उसमें सफलता पा सके।

तीसरे लक्षण में बताया गया है कि विद्यार्थी को सदैव सजग एवं सतर्क रहना चाहिए। इसीलिए उसकी नींद एक कुत्ते की तरह होनी चाहिए, जो थोड़ी सी आहट पाते ही जग कर सतर्क हो जाता है। विद्यार्थी की नींद पतली होनी चाहिए।

चौथे लक्षण के रूप में अल्पाहार की चर्चा की गई है। अर्थात विद्यार्थी को कम भोजन करना चाहिए। अत्यधिक भोजन करने से मन में आलस्य आ जाता है, जिससे विद्यार्थी चुस्ती एवं फुर्ती से अपने कार्य करने में अक्षम हो सकते हैं। इसीलिए विद्यार्थी को आवश्यकता अनुसार ही भोजन करना चाहिए ताकि वह सक्रिय रह सके।

अंत में गृह के त्याग को विद्यार्थी के पांचवें लक्षण के रूप में बताया गया है। अर्थात एक विद्यार्थी को अपने घर से दूर रहना चाहिए। घर का त्याग आवश्यक है क्योंकि घर - परिवार जन एवं संबंधियों का स्नेह विद्या अर्जन करने में बाधा बनते हैं।

अतः विद्यार्थी को इन संबंधों से दूर रहकर केवल अपनी विद्या पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यही विद्यार्थी के पांच लक्षण हैं, जो उसे अपने जीवन में सफल बनाते हैं।

2 ) गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

उपर्युक्त श्लोक विद्यार्थियों के लिए बहुत विशेष है। इस श्लोक के माध्यम से उन्हें अपने जीवन में गुरु के स्थान एवं महत्व के बारे में पता चलता है। श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि गुरु ही ब्रह्मा है।

यहाँ गुरु को भगवान ब्रह्मा की उपाधि दी गई है। अर्थात, गुरु ही सृष्टि के निर्माता के समान हैं। श्लोक में आगे कहा गया है कि गुरु ही विष्णु हैं, अर्थात गुरु ही संसार के संरक्षक व पालन कर्ता हैं। गुरु ही महेश्वर, अर्थात भगवान शिव जो कि संहारक हैं, उनके समान हैैं। अर्थात गुरु ही अज्ञान का विध्वंस कर ज्ञान की स्थापना करते हैं।

श्लोक की आगे की पंक्तियों में कहा गया है कि गुरु ही धरती पर साक्षात परम ब्रह्म परमेश्वर हैं और उस एकमात्र सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूं। इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि गुरु का स्थान ईश्वर की समानांतर है, क्योंकि गुरु ही हैं जो हमें संसार के हर ज्ञान से अवगत कराते हैं। अतः विद्यार्थी को चाहिए कि वह सदैव अपने गुरु का आदर करें।

3 ) सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृष्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥

प्रस्तुत श्लोक में विवेक के महत्व के बारे में बताया गया है। यह श्लोक विशेषकर उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अत्यंत उत्साहित रहते हैं एवं कई मौकों पर विवेक खो देते हैं।

श्लोक की प्रथम पंक्ति कहती है कि अचानक आवेश में आकर, बिना सोच-विचार कर कोई भी काम नहीं करना चाहिए। बिना सोचे समझे किया गया काम विनाशकारी सिद्ध होता है क्योंकि विवेक हीनता एवं विवेक शून्यता सबसे विशाल विपत्तियों का घर अर्थात मूल कारण होती हैं।


इसके विपरीत जो व्यक्ति विचार विमर्श कर, सोच समझकर कार्य करता है उसे स्वयं ही गुणों से लुब्ध अर्थात आकृष्ट होने वाली धनसंपदा की देवी मां लक्ष्मी चुन लेती है।
अर्थात उसे स्वयं ही धन - संपदा, एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इस श्लोक से हमें शिक्षा मिलती है कि जीवन में हर कार्य सोच समझकर एवं विवेक धारण करके करना चाहिए। कोई भी कार्य जल्दबाजी या आवेश में आकर नहीं करना चाहिए।

4 ) क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥


प्रस्तुत श्लोक में सुंदर अलंकारों का प्रयोग कर जीवन में विद्या एवं धन का संचय करने की बात बताई गई है। "क्षण" एवं "कण" शब्द का सुंदरता से प्रयोग किया गया है और कहा गया है कि एक-एक क्षण का उपयोग कर एवं एक-एक कण का उपयोग कर धन साधना ( प्राप्त करना) चाहिए।

तात्पर्य यह है कि प्रत्येक क्षण का सदुपयोग कर विद्या प्राप्त करनी चाहिए एवं हर कण का संचय कर धन संचित करना चाहिए। श्लोक की दूसरी पंक्ति कहती है कि जो इन क्षणों का त्याग करता है, अर्थात जो समय यूं ही गवा देता है उसे विद्या कहां से प्राप्त होगी?

और जो कण का महत्व नहीं समझता और उसे गवा देता है, उसे धन कहां से प्राप्त होगा?

अर्थात क्षण गवाने वाले को विद्या नहीं मिल सकती और कण गवाने वाले को कभी धन नहीं प्राप्त हो सकता। प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से विद्यार्थियों को एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश मिलता है। प्रस्तुत श्लोक हमें प्रेरणा देता है कि विद्यार्थी जीवन को विद्या के अर्जन में लगाना चाहिए। क्योंकि समय गंवाने वाले को विद्या प्राप्त कभी नहीं होती।

निष्कर्ष :
तो पाठकों यह थे वह श्लोक जो विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं। इस लेख में लिखा गया प्रत्येक श्लोक अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश प्रतिपादित करता है जिनका पालन कर विद्यार्थी अपने जीवन को और भी बेहतर एवं सार्थक बना सकते हैं।

इन श्लोकों में उन गुणों एवं लक्षणों की चर्चा की गई है जिसका पालन करना विद्यार्थी के लिए केवल लाभकारी ही नहीं, बल्कि अवश्यंभावी रूप से आवश्यक है। आशा है कि जितने भी विद्यार्थी इस लेख को पढ़ रहे हैं, वह सभी इन श्लोकों से प्रेरणा लेकर इन में दी गई सीख को अपने जीवन में जरूर उतारेंगे एवं अपने विद्यार्थी जीवन को सफल बनाएंगे।

यदि इस लेख से जुड़ी कोई राय अथवा प्रश्न आपके मन में हो तो अपनी राय ज़रूर पोस्ट करें। यदि आपके पास विद्यार्थियों के लिए अन्य उपयोगी श्लोक हैं, तो आप अपनी राय अवश्य साझा करें।


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