रीति - नीति सिखाते बिहारी लाल के प्रसिद्ध दोहे

रीति - नीति सिखाते बिहारी लाल के प्रसिद्ध दोहे

  

नमस्कार मित्रों ! आज हम बात कर रहे हैं रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक, महान कवि बिहारीलाल के बारे में। रीतिकाल की रचनाओं में बिहारी लाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनका पूरा नाम बिहारीलाल चौबे था। संत बिहारी का जन्म पिता केशव राय के घर ग्वालियर में हुआ था। उन्होंने अपना बाल्यकाल ग्वालियर में तथा युवावस्था मथुरा में बिताया। बिहारी राजा जयसिंह के राज्य कवि एवं शाहजहां के समकालीन थे। दोनों के रूप में बिहारी ने कई सुंदर रचनाएं की है जिन का संकलन "बिहारी सतसई" के रूप में है। यह उनकी प्रमुख रचना मानी जाती है जिसमें लगभग 719 दोहे हैं।

बिहारी ने अपने दोहों को ब्रजभाषा में लिखा था। बिहारी के दोहों के बारे में कहा जाता है कि उनके दोहे उन तीरों के समान है जो देखने में तो छोटे लगते हैं, लेकिन शरीर पर गंभीर घाव कर जाते हैं। अर्थात बिहारी के दोहे सरल एवं छोटे हैं किंतु उनके पीछे बहुत बड़ा संदेश छुपा होता है। अपने जीवन काल में बिहारी ने रीति-नीति, भक्ति अध्यात्म एवं श्रृंगार परक रचनाएं की है जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं। वह बहुत बड़े कृष्ण भक्त थे एवं उन्होंने अपनी इसी भक्ति को पूरे समाज के लिए ज्ञान के एक स्त्रोत में परिवर्तित कर दिया। तो आइए मित्रों जानते हैं बिहारी की कुछ उत्कृष्ट दोनों को :

1 ) जपमाला छापैं तिलक , सरै न एकौ कामु।
मन काचै नाचै वृथा , साँचै राँचै रामु।।

बिहारी लाल द्वारा रचित यह दोहा यह इस ओर इंगित करता है कि ईश्वर बाहरी दिखावे से प्रसन्न नहीं होते, बल्कि मनुष्य के अंदर की भक्ति एवं निष्ठा भाव से प्रभावित होते हैं। यही संदेश देते हुए कवि बिहारी कहते हैं कि भगवान के नाम की माला जपने से, छापा कर लेने से और तिलक लगा लेने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि यह सब बाहरी आडंबर एवं दिखावे है।

"मन कांचै नाचै वृथा", अर्थात व्यक्ति का मन कच्चा है, उसके मन में ईश्वर के लिए सच्ची भक्ति एवं प्रेम की भावना नहीं है, किंतु वह केवल बाहरी पाखंड से उन्हें पाने की कोशिश करता है, तो यह सब पूर्णतः व्यर्थ है। इससे उसे भगवान का आशीर्वाद कभी नहीं मिल सकेगा। क्योंकि राम, अर्थात इस वर्ष केवल सच्ची भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं जो व्यक्ति के मन में विद्यमान होती है। बाहरी पाखंड का ईश्वर के लिए कोई मोल नहीं । यदि मन में सच्ची श्रद्धा एवं भक्ति ना हो।

इस दोहे से आपको क्या शिक्षा मिलती है ?

मित्रों इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पहले ईश्वर को सच्चे मन से पूजना चाहिए । बाहरी सभी वासनाओं को त्याग कर मन को निर्मल करना चाहिए, तभी ईश्वर से मिलन संभव है।

2 ) कब को टेरत दिन है, होत न स्याम सहाय।
तुम हूँ लागी जगत गुरु, जगनायक जग बाय।।

प्रस्तुत दोहे में कवि बिहारी ने भगवान श्री कृष्ण को संबोधित किया है। उन्होंने यहां प्रभु के प्रति असंतोष एवं दुख व्यक्त किया है। वह कहते हैं - हे कृष्ण ! हे कान्हा ! मैं दीन, असहाय कब से तुम्हें पुकार रहा हूं, कब से तुम्हारे सामने अपने व्याकुल मन की व्यथा का बखान कर रहा हूं। किंतु तुम मेरी पुकार सुनकर भी मेरी मदद नहीं कर रहे हो। ऐसा प्रतीत होता है कि इस संसार को चलाने वाला भी इसी संसार के नक्शे कदम पर चल रहा है। तुम्हें भी इस संसार की हवा लग गई है । अर्थात तुम भी इस संसार की भांति स्वार्थी बन गए हो इसीलिए मेरे कष्ट का तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है।

मित्रों इस दोहे में बिहारी संबोधन तो भगवान श्री कृष्ण को कर रहे हैं, किंतु इस संबोधन में उन्होंने संसार पर एक बहुत बड़ा कटाक्ष किया है। उन्होंने कृष्ण को संसार की हवा लग जाने की बात कहते हुए यह जताया है कि वर्तमान समय में सभी लोग स्वार्थी हो चुके हैं, जिन्हें दूसरों के कष्ट से कोई मतलब नहीं और कोई किसी की मदद नहीं करता। उन्होंने हम सब को यह अहसास कराया है कि हम मनुष्य कितने स्वार्थी हो चले हैं । अतः मनुष्य को इस दोहे से सीख लेकर परोपकार को अपनाना चाहिए।

3 ) कोटि जतन कोउ करै, परै न प्राकृतिहिं बीच।
नल बल जल ऊँचो चढ़े, तउ नीच को नीच।।

इस दोहे के माध्यम से कवि ने संदेश दिया है कि प्रकृति में हर वस्तु, हर प्राणी का स्वभाव पूर्व नियोजित है, जिससे परिवर्तित नहीं किया जा सकता। बिहारी कह रहे हैं कि कोई चाहे करोड़ों जतन कर ले, कितने ही प्रयास क्यों न कर, लेकिन किसी के मूल स्वभाव को परिवर्तित नहीं कर सकता। यदि एक पल के लिए परिवर्तन ला भी दिया जाए, तो दूसरे ही पल वह पुनः अपने स्वभाव को धारण कर लेगा।

इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए बिहारी आगे कहते हैं कि नल के जोर से बलपूर्वक पानी बाल्टी के ऊपर तो चढ जाता है, किंतु कुछ समय बाद वह पुनः अपने स्वभाव के अनुसार नीचे की ओर बहने लगता है। भावार्थ यह है कि जिसका जो स्वभाव है, वह उस से विमुख नहीं हो सकता। ऐसे में बलपूर्वक किसी के स्वभाव को परिवर्तित करने का प्रयास व्यर्थ है। इससे हमें यह सीख भी मिलती है कि किसी भी व्यक्ति के स्वभाव में कुछ समय के लिए आए परिवर्तन को स्थाई नहीं समझ लेना चाहिए । क्योंकि कुछ देर बाद वह फिर अपने उसी रूप में आ जाएगा। यही प्रकृति का नियम है।

4 ) घरु घरु दोलत दिन है, जनु जनु जाचतु जाइ।
दियों लोभ चसमा चखनु, लघु पुनि बड़ो लखाइ।।

उपयुक्त दोहे में कवि ने लोभी व्यक्ति के आचरण से हमें दो - चार कराया है। वह कहते हैं कि जिस व्यक्ति के मन में लोभ होता है, वह गरीब दीन हीन बनकर घर-घर घूमता फिरता रहता है, इस लालच में कि कहीं से उसे कुछ प्राप्त हो जाए। वह इसी प्रकार हर व्यक्ति से कुछ पा लेने की इच्छा में सब को जाँचता एवं परखता रहता है, एवं सभी से कुछ ना कुछ याचना करता रहता है।

कवि कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति की आंखों पर लोभ का चश्मा चढ जाता है, और इसी कारण उसे निम्न, असक्षम व्यक्ति भी बड़ा नजर आने लगता है। गरीब भी उसे अमीर लगने लगता है और वह असमर्थ व्यक्ति से भी कुछ भी मांग बैठता है। तात्पर्य यह है कि व्यक्ति लोभ के प्रभाव में इस प्रकार जकड़ जाता है कि वह पूर्णतः विवेक हीन हो जाता है और योग्य अयोग्य व्यक्ति के बीच का भेद भुला बैठता है।

5 ) कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय नर, वा पाए बौराय।।

इस दोहे में कवि ने यमक अलंकार का बहुत ही सुंदरता से प्रयोग किया है, जहां यह संदेश प्रेषित किया गया है कि धन के लोभ में व्यक्ति किस प्रकार पागल बन जाता है। इस दोहे में दो बार कनक शब्द का प्रयोग किया गया है। पहले कनक का अर्थ है धतूरा जिसे खा लेने से व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और दूसरे कनक का अर्थ है सोना। ऐसे में कवि बिहारी का कहना है कि सोने में धतूरे के वनस्पति 100 गुना अधिक नशा या मादकता होती है। धतूरा खाने के बाद व्यक्ति पागल हो जाता है, जबकि सोने को तो केवल प्राप्त कर लेने मात्र से ही व्यक्ति पागल हो जाता है।

भावार्थ यह है कि धन के लोग व्यक्ति को भ्रमित कर देता है । धन के मद में व्यक्ति वैसा ही व्यवहार करने लगता है जैसे वह नशे में हो, एवं उचित अनुचित का सारा भेद भुला देता है। इसीलिए धन के प्रभाव में खुद को बहकने से रोकना चाहिए एवं विवेक धारण करना चाहिए।

तो मित्रों, आपने बिहारी जी के सुंदर दोहों का आनंद लिया, और सीखा कि ईश्वर प्राप्ति के लिए मन में सच्ची श्रद्धा होनी चाहिये, मनुष्य को परोपकारी बनना चाहिये, अपने मूल स्वभाव को कभी छोड़ना नहीं चाहिये एवं लोभ के स्थान पर विवेक से काम लेना चाहिये। निश्चय ही इन सीखों को जान कर आप अपने जीवन में ऐसे बदलाव कर पाएंगे, जिनसे आप और भी बेहतर बनें।


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