महा कवि वृंद के अनमोल दोहे और उनके अर्थ

महा कवि वृंद के अनमोल दोहे और उनके अर्थ

  

वृंद शाही दरबारी कवि थे, जिनका नाम रीतिकाल के कवियों में प्रमुखता से लिया जाता है। इनका पूरा नाम वृंदावनदास था। जोधपुर में जन्मे महा कवि वृंद ने कई सुंदर रचनाएँ की हैं। मात्र दस वर्ष की आयु में इन्होंने गुरु तारा जी से शास्त्र, काव्य एवं दर्शन ज्ञान ग्रहण किया। अपना संपूर्ण जीवन काव्य को समर्पित करने के पश्चात 1723 इस्वी में कवि वर ने अंतिम स्वास ले कर देह त्याग किया।

किंतु कवि महोदय की रचनाओं ने उन्होंने सदैव के लिए अमर बना दिया है। उन्होंने अपने काव्यों के माध्यम से न सिर्फ हिंदी साहित्य को बहुमुल्य भेंट दी है, बल्कि जन समान्य तक जीवन दर्शन को पहुंचाया है, जो अनंत काल तक मानव का हित करती रहेंगी।

वृंद जी की प्रमुख कृतियाँ हैं - भारत कथा, वृंद ग्रंथावली, भाव पंचाशिका, श्रृंगार शिक्षा, वचनिका, सत्य स्वरूप, पोन पचीसी, यमक सतसई, वृन्द सतसई, हितोपदेशाष्ट, समेत शिखर छंद इत्यादि।

तो आइये पाठकों, कविवर की कुछ उत्कृष्ट रचनाओं का आनंद लें, और इनसे जीवन की बहुमुल्य शिक्षा ग्रहण करें :

1 ) अपनी पहुंच बिचारी के, करतब कीजिए दौर।
तेते पांव पसारिये, जेती लंबी सौर।

प्रस्तुत दोहे में कविवर वृंद ने यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। किंतु इच्छाओं की पूर्ति अपनी क्षमता को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। ऐसा ना करने पर मनुष्य को बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं।

दोहे की पहली पंक्ति में कविवर कहते हैं कि अपनी पहुंच, अपनी स्थिति के बारे में भली-भांति सोच विचार कर लेने के बाद ही कोई कार्य करना चाहिए। अपनी क्षमता का आकलन करने के बाद ही हमें निश्चय करना चाहिए कि कोई कार्य किस हद तक हम कर सकते हैं।

उसके बाद कवि कहते हैं कि उतने ही पांव फैलाने चाहिए, जितनी लंबी चादर हो। अर्थात उतनी ही आकांक्षाएं रखिए जितनी आप पूरी कर सकते हैं। यदि आपकी इच्छाएं आपकी क्षमता से अधिक बड़ी होगी, तो आपको कभी संतुष्टि नहीं मिलेगी।

प्रस्तुत दोहे से हमें यह संदेश मिलता है कि व्यक्ति को अपनी स्तिथि का बोध सदैव होना चाहिये । उदाहरण स्वरुप एक व्यक्ति ऐश्वर्य एवं धन से परिपूर्ण जीवन जीना चाहता है, किंतु उसकी आय सीमित है। अपनी संपूर्ण आय को अपने शौक पूरे करने में लगा देने से व्यक्ति के पास कुछ संचय नहीं बचता है।

इच्छाएं धीरे-धीरे और भी बढ़ती जाती हैं, और परिणाम स्वरूप व्यक्ति की स्थिति ऐसी हो जाती है कि वह न वर्तमान में सुखी रहता है, और ना ही उसका भविष्य निश्चित होता है। अतः संतोषी बने।

2 ) स्वारथ के सबहिं सगे, बिना स्वारथ कोउ नाहीं।
सवै पंछी सरस तरु, निरस भए उड़ी जाए।

प्रस्तुत दोहे के माध्यम से कविवर वृंद जी ने यह संदेश प्रतिपादित किया है कि संसार में सभी संबंधों के पीछे कुछ ना कुछ स्वार्थ अवश्य निहित होता है।वह कहते हैं कि स्वार्थ के कारण ही सभी सगे हैं। अर्थात स्वार्थ के कारण ही संबंध एवं संबंधियों का अस्तित्व है। बिना स्वार्थ के कोई भी किसी का नहीं होता।

यदि व्यक्ति का आपसी स्वार्थ खत्म हो जाए, तो लोग एक दूसरे के लिए पराए हो जाते हैं। इस प्रकरण का उत्कृष्ट उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि स्वार्थ एवं संबंध वैसे ही है, जिस प्रकार किसी वृक्ष पर पंछी तब ही तक रहते हैं, जब तक वह हरा - भरा व सुंदर होता है।

किंतु जब वही वृक्ष सूख जाता है, तो सभी पंछी उस वृक्ष को छोड़ कर उड़ जाते हैं। यहां पंछियों को वृक्ष से जब तक आश्रय, छाँव, फल इत्यादि मिलती है, तब तक वे उस पर अपना बसेरा डालते हैं ।

किंतु जैसे ही वृक्ष उनके काम का नहीं रहता, वह उसे छोड़कर दूसरे वृक्ष पर चले जाते हैं। वह इस बात की परवाह नहीं करते कि वृक्ष ने उन्हें आश्रय देकर उनके ऊपर एहसान किया है। वह केवल अपना स्वार्थ देखते हैं। ऐसा ही मनुष्य के साथ होता है।

मित्रों, प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी से अधिक मोह नहीं रखना चाहिए । इस बात का सदैव स्मरण रखना चाहिए कि हर व्यक्ति और हर संबंध स्वार्थ के कारण बने हैं ।

3 ) विद्या धन उद्यम बिना, कहां जु पावै कौन।
बिना झुलाए ना मिलै, ज्यों पंखा का पौन।

उपर्युक्त दोहे में कविवर ने यह संदेश दिया है कि विद्या प्राप्त करना सरल नहीं है। विद्या तपस्या के समान है, जिसमें कठोर परिश्रम एवं श्रम करना पड़ता है। विद्या ना तो खरीदी जा सकती हैं, ना ही बेची जा सकती है, और ना ही विरासत में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक जाती है। विद्या प्राप्त करने का केवल एक ही माध्यम है, और वह है कठोर परिश्रम । केवल कठोर परिश्रम द्वारा ही विद्या को आत्मसात किया जा सकता है।

कविवर ने दोहे की पहली पंक्ति में कहा है कि - विद्या धन के समान है। विद्या को धन के अनुरूप बताते हुए कवि कह रहे हैं कि विद्या रूपी धन उद्यम, अर्थात श्रम के बिना आखिर कौन पा सकता है?

विद्या को धन इसीलिए कहा गया है क्योंकि इसके बल पर ही व्यक्ति बुद्धिमता प्राप्त करता है, और बुद्धिमता के बल पर ही धन का संचय कर पाता है। उदाहरण देते हुए वृंद कवि वर कहते हैं कि पंखे से हवा भी तभी मिलती है, जब उसके हिलाया जाता है। बिना मेहनत किए तो पंखे से हवा तक नहीं मिलती। फिर विद्या तो कठोर साधना से प्राप्त होती है।

प्रस्तुत दोहे से हमें यह संदेश मिलता है कि संसार में कोई भी वस्तु बिना श्रम किए प्राप्त नहीं जा सकती है। अतः यदि हमें विद्या चाहिए, तो हमें आलस्य का त्याग कर उद्यमी बनना ही होगा, नहीं तो हम विद्याहीन रह जाएंगे।

4) दान दीन को दीजै, मिटै दरिद्र की पीर।

औषध ताको दीजै, जाके रोग शरीर।

प्रस्तुत दोहे में कविवर वृंद कहना चाहते हैं जिसे जिस वस्तु की आवश्यकता है , वह उसे ही प्राप्त होना चाहिए। जिसके पास वह वस्तु पहले से ही मौजूद है, उसे उसकी क्या आवश्यकता?

बहुतायत में किसी के पास वह वस्तु होने से उस वस्तु का दान व्यर्थ हो जाएगा। किंतु यदि वही वस्तु किसी जरूरतमंद को दी जाए, तो वस्तु का दान सार्थक हो जाएगा।

इसी संदेश को प्रतिपादित करते हुए कवि ने दोहे की पहली पंक्ति में कहा है कि यदि दान करना है, तो गरीब व्यक्ति को किया जाना चाहिए। ताकि गरीबी के कारण उसे जो कष्ट है, वह दूर हो सके।

यदि किसी धनी को धन का दान दिया जाए, तो ऐसे दान का क्या क्या लाभ? जिसके पास पहले से अन्न एवं धन की पर्याप्त मात्रा है, भला उसे दान करके क्या लाभ मिल सकता है?

उसकी स्थिति तो दान से पूर्व एवं पश्चात, एक समान ही रहेगी। कविवर के अनुसार दान गरीब को ही किया जाना चाहिये, ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार औषधि उसी को दी जानी चाहिए जिसके शरीर में रोग हो। स्वस्थ व्यक्ति को भला औषधि से क्या लाभ? किंतु एक रोगी को यदि औषधि मिल जाए, तो उसका जीवन सुधर जाता है एवं वह निरोगी बन जाता जाता है।

तो मित्रों, प्रस्तुत दोहे से हमें यह सीख मिली है कि दान तभी सफल होता है, जब वह जरूरतमंद को दिया जाए। अमीर व्यक्ति को दान करना निरर्थक है। तो यदि आपके पास भी कुछ अधिक मात्रा में हो, तो उसे दूसरों के भले में लगाएं ।

5 ) क्यों कीजे ऐसो जतन, जाते काज ना होय।
परबत पर खोदै कुँवा, कैसे निकरै तोय।

प्रस्तुत दोहे में कविवर वृंद जी ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए प्रयास एवं परिश्रम सर्वोपरि एवं सबसे आवश्यक है। किंतु वह सही दिशा में होना चाहिए। यदि अथक प्रयास करने पर भी कार्य का फल नहीं मिल रहा, तो समझ जाना चाहिए कि हमारा प्रयास सही दिशा में नहीं हो रहा है।

इसी संदेश के साथ दोहे की पहली पंक्ति कहती है कि : क्यों ऐसा जतन, अर्थात प्रयास करते हो जिससे कार्य की सिद्धि हो ही नहीं पा रही है? ऐसे प्रयास को छोड़ देना चाहिए जिससे लक्ष्य पूर्ण नहीं हो।

क्योंकि वह प्रयास उस लक्ष्य के लिए नहीं है। कविवर आगे कहते हैं कि पर्वत पर कुआं खोदने का प्रयास निरर्थक है। कितना भी प्रयास कर लिया जाए तब भी पर्वत पर कुआं खोदने से पानी कभी नहीं निकलने वाला । क्योंकि यह प्रयास दिशाहीन है ।इस विचार को त्याग देना ही उचित है।

प्रस्तुत दोहे ने हमें बहुत बड़ी सीख दी है कि केवल प्रयास ही जरूरी नहीं है, बल्कि प्रयास का सही दिशा में होना अधिक आवश्यक है। हमें अपनी ऊर्जा को वही लगानी चाहिए जहां उसका फल मिले। अतः किसी भी योजना पर कार्य बहुत सोच-विचार कर आरंभ करना चाहिए।

निष्कर्ष :

तो मित्रों, देखा आपने कि किस प्रकार कविवर वृंद ने अपने उत्कृष्ट दोहों के माध्यम से जनसामान्य तक कितना बहुमूल्य संदेश प्रतिपादित किया है। जीवन का कोई ऐसा पहलू नहीं है, जिस पर वृंद जी ने अपनी रचनाएं ना की हो। कविवर के दोहे बताते हैं कि उन्होंने जीवन को कितने सूक्ष्म स्तर पर देखा एवं अनुभव किया है।

तभी जाकर उनके दोहे इतने सुंदर एवं आज भी उतने ही प्रासंगिक है। इन दोनों से मिली सीख हीरे जवाहरात जैसे रत्नों से कम से कम बहुमूल्य नहीं है। अतः यह हमारा कर्तव्य है कि आज मिली इन सभी सीखों को हम आत्मसात करें, एवं जीवन के हर कदम पर इन सीखो का प्रयोग कर अपने जीवन को सफल बनाएं।


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