प्रेम करना सिखाते अनमोल दोहे

प्रेम करना सिखाते अनमोल दोहे

  

मित्रों, हम मनुष्य अपने जीवन में कई लोगों से प्रेम करते हैं। माता-पिता, मित्र, जीवनसाथी, संतान, संबंधी, आस - पड़ोसी, प्रकृति, वस्तु, कई रूपों में प्रेम हमारे जीवन में उपस्थित है। मित्रों, प्रेम वह भावना है जो व्यक्ति को पवित्र, सुखी एवं संपूर्ण बनाती है। वह प्रेम ही है जो मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है, वह प्रेम ही है जिससे मानवता जैसे मूल्यों का जन्म हुआ है, वह प्रेम ही है, जो सभी संबंधों का आधार है।

यदि यह भी कहा जाए कि इस संसार को चलाने वाली शक्ति प्रेम ही है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसी प्रेम पर न जाने कितने ही काव्य, कितनी किताबें, कितनी कविताएं, कितनी रचनाएं मौजूद हैं, जो अलग-अलग रूपों में इस भावना की व्याख्या करती हैं। ऐसी ही रचनाओं में से एक हैं, - "दोहे", जो आमजन की भाषा में लिखें जाते हैं। दोहे अति सरल एवं सहज भाषा में निर्मित होते हैं किंतु उनके पीछे एक बहुत गुढ़ संदेश छुपा होता है। प्रेम पर भी अत्यंत सुंदर दोहे लिखे गए हैं। तो आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ दोहों को :

1 )आगि आंचि सहना सुगम , सुगम खडग की धार ।
नेह निबाहन एक राम ,महा कठिन व्यवहार ।

यह दोहा महान संत कवि कबीर द्वारा लिखा गया है। इस दोहे में यह संदेश दिया गया है कि प्रेम को निभाना सरल नहीं बल्कि अत्यंत कठिन है। कई लोग प्रेम कर तो लेते हैं, लेकिन उसे निभा नहीं पाते। इसी बात का उल्लेख करते हुए कबीर दास यहां प्रेम की महिमा का बखान कर रहे हैं और कह रहे हैं कि प्रेम का निर्वाह करना इतना कठिन है, कि उसके सामने अग्नि की आंच अर्थात ताप को सहन करना भी सरल है ।

यही नही, बल्कि प्रेम का निर्वाह करने से भी सरल प्रतीत होता है तलवार की धार का सामना करना । किंतु प्रेम वह व्यवहार है, जिसका निर्वाह करना सबसे कठिन है। प्रेम में आ रहे उतार-चढ़ाव, जिनमें आपसी मतभेद, भिन्नता, बलिदान करना इत्यादि शामिल हैं, इन सभी उतार-चढ़ावो का सामना करना बहुत ही कठिन है। प्रेम में खुद को पूरी तरह भुला कर हमें दूसरों के बारे में अधिक सोचना होता है। यही प्रेम है । ऐसा व्यवहार कर पाना आग की ताप में जलने से भी सरल है।

2 ) प्रेम न बारी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय
राजा प्रजा जेहि रुचै, शीश देयी ले जाय

प्रस्तुत दोहा संत कवि कबीर द्वारा लिखा गया है जिसमें उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है की प्रेम व्यक्ति के सहज भाव से उत्पन्न होता है। प्रेम को ना ही खरीदा जा सकता है, और ना ही अहंकार करके प्रेम किया जा सकता है। यह समझाते हुए कवि ने दोहे में कहा है कि प्रेम न ही बगीचे में उपजता है, ना ही प्रेम किसी हाथ, अर्थात बाजार में बिकने वाली वस्तु है।

राजा अथवा प्रजा, अर्थात अमीर हो या गरीब, सक्षम हो या असक्षम, कोई भी प्रेम को पा सकता है । कवि कहते हैं कि अपना शीश देकर कोई भी प्रेम को पा सकता है। यहां शीश का अर्थ है अहंकार एवं अभिमान। अहंकार एवं अभिमान त्याग कर ही प्रेम पाया जा सकता है। क्योंकि प्रेम में "मैं" की भावना या लेने की भावना नहीं, अपितु देने की भावना निहित होती है । निस्वार्थ मन से, अहम मिटा कर ही कोई भी व्यक्ति प्रेम को पा सकता है।

3 ) शास्त्रन पढ़ि पंडित भए, कै मौलवी कुरान
जुए प्रेम जान्यों नहीं, कहा कैयौ रसखान

प्रस्तुत दोहा विख्यात रचनाकार रसखान द्वारा निर्मित है। यहां उन्होंने प्रेम की महिमामंडन की है और इसके महत्व का परिचय दिया है। प्रस्तुत दोहे में रसखान ने प्रेम को शास्त्रों से भी ऊंचा स्थान दिया है। वह कहते हैं कि जिन्होंने कई शास्त्र पढ़कर ज्ञान अर्जित किया वह पंडित बन गए, जिन्होंने पवित्र ग्रंथ कुरान शरीफ पढ़ा वह मौलवी बन गए, किंतु यदि शास्त्र एवं कुरान पढ़ने के पश्चात भी उन्होंने प्रेम को नहीं जाना तो पंडित और मौलवी का सारा ज्ञान पूर्णतः व्यर्थ है।

यहां कवि ने समझाया है कि प्रेम सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। हजार पोथियाँ पढ़ने पर भी यदि कोई व्यक्ति प्रेम से अनभिज्ञ है तो उसका सारा ही ज्ञान व्यर्थ है, क्योंकि इस संसार में प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है।

4 ) रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर न जुड़े जुड़े गाँठ बन जाए

प्रस्तुत दोहा रहीम द्वारा रचित है, जिसमें वह बता रहे हैं कि प्रेम एक नाजुक डोर की तरह है, जिसे बहुत संभाल कर, सहेज कर रखना होता है । यदि उसमें जरा सी भी गांठ बन जाए, तो प्रेम का धागा कमजोर बन जाता है और ज्यादा समय तक नहीं टिक पाता। रहीम ने कहा है कि हे मनुष्य ! इस प्रेम रूपी धागे को झटके से मत तोड़ो।

यहां प्रेम रूपी धागे को तोड़ने का तात्पर्य है कि जिनसे हम प्रेम करते हैं उनसे छल, कपट, धोखा या उनका दिल नहीं दुखाना चाहिए। क्योंकि यदि यह प्रेम रूपी धागा टूट गया तो जुड़ेगा नहीं, अर्थात यदि एक बार आपने अपने प्रिय जनों का विश्वास खो दिया तो फिर वह प्रेम दोबारा लौटकर नहीं आएगा। फिर रहीम कहते हैं कि यदि यह प्रेम रूपी नाजुक धागा जुड़ भी गया तो इसमें गांठ बन जाएगी। अर्थात यदि आपके प्रिय जनों और आपके बीच प्रेम पुनः स्थापित हो भी गया तो, एक गांठ हमेशा रहेगी । तात्पर्य यह है कि उनके मन में वह दुखदाई घटना घर कर जाएगी और आपके प्रेम में शंका जैसे भावनाएं उत्पन्न हो जाएंगे।

तो मित्रों, देखा आपने किस तरह यह सुंदर दोहे एक तरफ हमें प्रेम की गहराइयों से दो-चार करवा रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ प्रेम को कैसे निभाया जाना चाहिए, प्रेम का महत्व क्या है, एवं प्रेम में कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसका ज्ञान भी दे रहे हैं। दोहे तो ऐसे ही होते हैं ! बातों ही बातों में अत्यंत गंभीर संदेश दे दिए जाते हैं।

इन सभी दोहों के भावार्थ ओं को जानकर हमें यह सीखें मिली हैं कि इस संसार में सर्वश्रेष्ठ भावना प्रेम ही है, जो कि सभी शास्त्रों का ज्ञान से भी बढ़कर है। सच्चा प्रेम करना अत्यंत कठिन व्यवहार है। प्रेम में कभी छल, कपट, इत्यादि नहीं करना चाहिए, नहीं तो प्रेम कमजोर हो जाता है। यह सब सीखें जीवन पर्यंत हमें प्रेम के मार्ग पर सही मायने में अग्रसर होने में सहायता करेंगी।


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