परिक्षा के डर को दूर करने के लिए सुझाव

परिक्षा के डर को दूर करने के लिए सुझाव

  

नमस्कार मित्रों, आज का लेख ऐसे विषय पर आधारित है, जो खासकर विद्यार्थियों के लिए है। यह उन अभिभावकों के लिए भी उपयोगी है जिनके बच्चे स्कूल अथवा कॉलेज में शिक्षारत है। जैसा कि आप शीर्षक पढ़ कर समझ गए होंगे, आज के लेख में हम परीक्षा के बारे में चर्चा कर रहे हैं।

मित्रों, अक्सर यह देखा जाता है कि बच्चे परीक्षा से बहुत डरते हैं। परीक्षा का नाम सुनकर ही उनके चेहरे उतर जाते हैं और ऐसा लगता है मानो यह उनके जीवन का सबसे डरावना अध्याय है।

जी हां, कई छात्रों की स्थिति बिल्कुल ऐसी है।

ऐसे में यह चर्चा अति आवश्यक है ताकि हम यह समझ पाए कि आखिर परीक्षा का इतना भय क्यों है और परीक्षा के इस भय को कैसे मिटाया जाए। आज की चर्चा में आप जानेंगे कि परीक्षा के डर से आप कैसे निपट सकते हैं। तो आइये जानें कि आप किस प्रकार परिक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं :

✴ सीखे समय प्रबंधन का नियम :

मित्रों, परीक्षा की घड़ी तब और भी डरावने लगने लगती है जब हमें यह एहसास होता है कि परीक्षा नजदीक है और हमारा पाठ्यक्रम अभी भी अधूरा है। जाहिर सी बात है पाठ्यक्रम को पूरा करने के लिए आपको पढ़ाई में अधिक समय देना होगा तभी जाकर आप पूरे सिलेबस को कवर कर पाएंगे।

लेकिन कई सारे विद्यार्थी इसी जगह अपने आप को असमंजस की स्थिति में पाते हैं। बच्चे यह नहीं समझ पाते कि वह दिन के समय को किस प्रकार प्रबंधित करें ताकि उनका पाठ्यक्रम पूर्ण हो सके।

ऐसे में वह घंटों तक इस बारे में सोचते रह जाते है कि क्या पढ़े, कब पढ़ें, और कितना पढ़ें और इसी उधेर बुन में उनका समय नष्ट होता रहता है। स्कूल जाना, ट्यूशन जाना और घर के कुछ काम आदि के बीच में वह समय निकाल पाने में असक्षम महसूस करते हैं।

ऐसे में हम आपको बता दें कि मित्रों, आपको यहां समय प्रबंधन सीखने की आवश्यकता है। समय प्रबंधन का गुण आपको कम समय में अधिक उत्पादकता प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगा।

अब बात आती है कि आखिर समय प्रबंधन कैसे किया जाए?

आइये जानें :

✴ इसके लिए सबसे पहले आप अपने आप को व्यवस्थित करने से शुरुआत करें। अर्थात आप क्या करना चाहते हैं और किस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समय प्रबंधन करना चाहते हैं वह निश्चित करें।

✴ अगले दिन आपको क्या और कितना पढ़ना है, इसे लिख कर रखें अर्थात क्रमवार सूची बनाकर रखें और अगले दिन इस सूची के हिसाब से ही अपनी पढ़ाई करें।

✴ समय प्रबंधन में माहिर बनने के लिए समय चुराना सीखे। जी हां, इस बात का अवलोकन करें कि दिन में आपके पास कितने घंटे ऐसे हैं, जो खाली होते हैं और जिनका इस्तेमाल आप अपनी पढ़ाई के लिए कर सकते हैं। इस प्रकार जब भी आपको थोड़ा सा भी समय मिले तो उस समय कुछ चुराकर अपनी पढ़ाई में जुट जाएं।

✴ सभी विषयों के लिए एक निश्चित समय का निर्धारण करें। दिन के अलग-अलग घंटों को अलग-अलग विषयों को पढ़ने के लिए निर्धारित करें।

✴ इसके साथ ही जब भी आप पढ़ने बैठे तो आपके दिमाग में यह बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए कि अब आप क्या पढ़ने जा रहे हैं। यदि आप इस बात को लेकर स्पष्ट ही नहीं है कि अब आप क्या पढ़ने वाले हैं तो ढेर सारा समय यही सोचने में निकल जाएगा कि कहां से शुरुआत की जाए।

इसलिए आपको पता होना चाहिए कि आप किस समय कौन सा विषय और कौनसा अध्याय पढ़ने वाले हैं।

इस तरह आप समय भी बचा पाएंगे और गुणवत्ता पूर्ण तरीके से अपनी पढ़ाई भी कर पाएंगे। इसका सीधा-सीधा असर परीक्षा में आपके अंकों एवं आपके आत्मविश्वास में दिखेगा। इसे जरूर आजमाएं। आप निराश नहीं होंगे।

✴ तनाव को कहें "गुड बाय" :

जी हां, आपको तनाव को अलविदा कहना ही होगा। क्योंकि अपने मस्तिष्क में तनाव के साथ आप बेहतर ढंग से पढ़ाई नहीं कर पाएंगे और ना ही परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाएंगे।

परीक्षा के दिनों में तनाव का होना बहुत स्वाभाविक सी बात है। हममें से ज्यादातर लोग परीक्षा से बहुत डरते हैं और जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आते हैं वैसे-वैसे हमारी घबराहट बढ़ती जाती है।

मित्रों दरिया घबराहट का होना कोई बुरी बात नहीं है। यह सभी प्राकृतिक मानवीय भावनाएं हैं जिनसे होकर हमें गुजरना ही पड़ता है। इसके साथ ही डर एक प्रकार से आवश्यक भी है क्योंकि डर होगा तभी तो आप बेहतर प्रदर्शन करने के लिए, मेहनत करने के लिए प्रेरित होते रहेंगे।

लेकिन स्थिति तब खराब हो जाती है जब आप इस डर को अपने ऊपर हावी होने देते हैं और दुर्भाग्यवश ज्यादातर बच्चों के साथ यही होता है। परीक्षा का भय धीरे-धीरे इतना बढ़ जाता है की बच्चे तनाव अथवा अवसाद की चपेट में आने लगते हैं।

इसका कारण आसपास हो रही प्रतियोगिता, पढ़ाई का बढ़ता दबाव, अच्छे अंक लाने का मानसिक दबाव इत्यादि है। यह तनाव बच्चों की मन में नकारात्मकता को जन्म देता है और उन्हें केवल मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक रूप से भी प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में हो सकता है कि आप बीमार पड़ जाए या फिर आप अपनी पढ़ाई में से शत प्रतिशत उत्पादकता हासिल नहीं कर पाएं।

कुछ बच्चे तो तनाव से इस प्रकार ग्रस्त हो जाते हैं कि अच्छी पढ़ाई करने के बावजूद भी जैसे ही वह परीक्षा कक्ष में बैठते हैं, वह पढ़ा हुआ सब कुछ भूल जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे उनके दिमाग में शून्य बैठ गया और उन्हें कुछ भी नहीं आता हो।

यह सब केवल तनाव और डर के कारण उत्पन्न भ्रम होता है। ऐसे बच्चे सब कुछ जानने के बाद भी परीक्षा में कुछ नहीं लिख पाते हैं और उनका प्रदर्शन बुरी तरह से प्रभावित होते है।

इसका कारण उनकी दुर्बलता या असफलता नहीं, बल्कि तनाव है। विद्यार्थियों और अभिभावकों दोनों को इस बात को समझना होगा और इस विषय को गंभीरता से लेना होगा।

इस तनाव का प्रबंधन कर आप इस परेशानी से निजात पा सकते हैं। ऐसा करने के लिए :

✴ अपने अभिभावकों से खुल कर बात करें कि आप अपने ऊपर कितना दबाव महसूस कर रहे हैं।

✴ इसके साथ ही परीक्षा से काफी पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर दें ताकि निकट दिनों में आप अधिक परेशान ना हो।

✴ पढ़ाई के बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लेते रहें और किसी खुली जगह पर टहले ताकि आप फ्रेश और ऊर्जावान महसूस करें।

✴ और सबसे जरूरी बात, अपने आप पर विश्वास रखें। खुद को किसी से भी कमतर ना आंकें।

अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाए, दूसरों से यह पूछना कि उन्होंने कितनी पढ़ाई की है इससे आपका तनाव बढ़ सकता है। इसीलिए आपको खुद पर विश्वास रखना चाहिए और दूसरों की नकल करने की बजाय अपने पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

✴ अभिभावकों के लिए सलाह :

मित्रों, परीक्षा की जितनी जिम्मेदारी बच्चों पर होती है उतनी ही उनके माता-पिता पर भी होती है। परीक्षा का दिन केवल बच्चों की नहीं, बल्कि माता-पिता की भी परीक्षा का दिन होता है।

ऐसे में बच्चों की परीक्षा में आपकी भूमिका और आपका योगदान बहुत बड़ा है। लेकिन कई बार माता - पिता अपनी भूमिका को नकारात्मक रूप दे देते हैं। जहां एक तरफ माता-पिता को बढ़-चढ़कर अपने बच्चे का हौसला बढ़ाना चाहिए, वहीं वह अपने बच्चों पर अच्छे अंक लाने का दबाव बनाने लगते हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि हर माता-पिता अपने बच्चे से बहुत प्यार करता है और उसे सफल होते हुए देखना चाहता है ।

साथ ही यदि बच्चा कुछ अच्छा करे तो समाज में माता-पिता की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। लेकिन माता पिता को अपनी आशाओं से इतना आसक्त नहीं हो जाना चाहिए कि उनकी आशाओं की पूर्ति करना बच्चों पर भारी पड़ने लगे ।

उम्मीद के कारण माता-पिता अपने बच्चों को सदैव कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं लेकिन हमें पता नहीं चलता कि कब हमारी प्रेरणा दबाव का रूप ले लेती है ।

कुछ माता-पिता के लिए अपने बच्चों के अंक बहुत मायने रखते हैं क्योंकि उनके हिसाब से उनका बच्चा सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए। इस सर्वश्रेष्ठता को हम अच्छे अंक के पैमाने पर तोलने लग जाते हैं और बच्चे पर निरंतर दबाव बनाने लग जाते हैं।

ऐसे में एक बात समझनी बहुत जरूरी है और वह यह है कि हर बच्चा और हर इंसान अपने आप में अनोखा और अलग होता है। कक्षा के सभी बच्चे एक समान नहीं होते और ना ही सब के अंक एक समान होते हैं। कोई पढ़ाई में अच्छा होता है तो कोई किसी अन्य कौशल में बेहतर होता है।

ऐसे में वह बच्चे जो पढ़ाई में अच्छे अंक नहीं ला पाते हैं उन्हें कमतर आंकना या उन्हें नीचे नजर से देखना अच्छी बात नहीं है। यदि परीक्षा में अच्छे अंक लाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं तो माता-पिता से उन्हें डांट फटकार इत्यादि सुननी पड़ती है जो उनके ऊपर नकारात्मक प्रभाव डालती है।

बच्चा अपनी क्षमता से अधिक प्रदर्शन कैसे कर पाएगा? इसीलिए अभिभावक को बच्चे के मन की स्थिति एवं उसकी क्षमता को समझना चाहिए। अच्छे अंक उसकी बुद्धिमता के परिचायक नहीं है इसीलिए अभिभावकों को बच्चे की अंक की जगह पर बच्चे की बुद्धिमता पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

✴ सेहत की अनदेखी भला क्यों करते हो?

मित्रों, क्या आपने एक बात गौर की है कि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो बाकी समय स्वस्थ रहते हैं, लेकिन ठीक परीक्षा के वक्त ही बीमार पड़ जाते हैं। ऐसा एक या दो नहीं, बल्कि बहुत बच्चों के साथ होता है।

ऐसे में कभी-कभी अभिभावकों एवं शिक्षकों द्वारा बच्चों को गलत समझ लिया जाता है। कई बार हम यह सोचने लग जाते हैं कि परीक्षा के डर से और परीक्षा ना देने के मन के कारण बच्चे बीमार होने का बहाना बना रहे हैं।

ऐसे में हम उनकी बातों का विश्वास भी नहीं करते। किंतु ऐसा सभी मामलों में नहीं होता। कुछ बच्चे वास्तव में परीक्षा के ही समय बीमार पड़ जाते हैं।

आखिर इसका कारण क्या है? बाकी समय ठीक रहने वाले बच्चों का परीक्षा वाले दिन ही बीमार क्यों पड़ जाते हैं?

यह सिर्फ उनका बहाना होता है या फिर बात कुछ और है। मित्रों, इस विषय में आपको समझदारी से सोचना होगा। सबसे पहले यह समझने का प्रयास करिए कि बच्चे आखिर परीक्षा के समय क्यों बीमार पड़ जाते हैं।

इसके दो कारण हैं :

पहला कारण वह है जिसकी चर्चा हमने ऊपर बिंदु में की है, और वह है तनाव।

बेशक परीक्षा के दिन काफी तनावपूर्ण होते हैं जहां मेहनत अधिक करनी होती है और मानसिक रूप से अच्छे अंक लाने का दबाव भी निरंतर बना रहता है। ऐसे में परेशानी उन बच्चों के लिए अधिक बढ़ जाती है जो परीक्षा के निकटतम दिनों में ही अपनी पढ़ाई पूरी करने का प्रयास करते हैं। साल भर कुछ नहीं पढ़ने के कारण अत्यधिक पाठ्यक्रम कम समय में पूरा करने का दबाव बनता है जो कि तनाव उत्पन्न करता है ।

दूसरा कारण है सेहत की अनदेखी करना। आपने देखा कि परीक्षा के दिनों में बच्चे दिन रात मेहनत करते हैं और 24 घंटे किताब खोल कर बैठे रहते हैं

ऐसे में वह अपने खाने पीने व्यायाम आदि का ख्याल नहीं रखते हैं। बिना ब्रेक लिए घंटों बैठकर पढ़ते रहने से शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूपों में शरीर प्रभावित होता है। पढ़ाई के रूप में शरीर पर पड़ा अत्यधिक दबाव और खानपान का बिगड़ जाने के कारण ही बच्चे परीक्षा के समय बीमार पड़ जाते हैं।

इस बीमारी का सीधा - सीधा असर उनके अंक पर पड़ता है। यदि उन्होंने बहुत मेहनत भी की हो तो यह बीमारी उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर देती है।

ऐसे में अपनी सेहत का ध्यान रखना कितना आवश्यक है इस बात को हमें जरूर समझना चाहिए। कई ऐसे बच्चे हैं जो पढ़ने के चक्कर में सेहत को हल्के में ले लेते हैं, लेकिन यह उनके लिए नकारात्मक सिद्ध होता है जिसका खामियाजा उन्हें परीक्षा के वक्त उठाना पड़ता है।

इसीलिए बच्चों, हमारी आप के लिए यह सलाह है कि पढ़ाई के साथ-साथ अपनी सेहत को भी उतना ही महत्व दें ताकि परीक्षा के दिनों में आप सेहतमंद, ऊर्जावान और स्वस्थ महसूस करें।

निष्कर्ष

तो देखा मित्र आपने यह थे कुछ बेहद आसान किंतु कारगर तरीके जो ना सिर्फ परीक्षा के डर को दूर भाग आएंगे बल्कि आपको बेहतर प्रदर्शन करने में भी मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। इस लेख को पढ़कर आपने यह भी जान लिया होगा की परीक्षा के समय अभिभावकों की जिम्मेदारी कितनी बढ़ जाती है।

साथ ही अब आप उन तरीकों से भी परिचित है जो आपको कम समय में बेहतर तैयारी करने में मददगार साबित होंगे। यदि आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो राय लिख कर हमारे साथ जरूर साझा करें। आपकी टिप्पणियों का हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा।


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