नीतिपरक दोहे अर्थ सहित

नीतिपरक दोहे अर्थ सहित

  

नमस्कार मित्रों ! आज के लेख में आप ऐसे दोहों का आनंद ले सकते हैं, जो पढ़ने में तो अत्यंत सुंदर हैं ही, किंतु साथ ही यह बहुत बड़ी सीख भी दे जाते हैं। हमने इस लेख में महा कवि वृंद, महान रहस्यवादी कवि कबीर दास जी, एवं विख्यात कवि व दार्शनिक रहीम जी के दोहों को सम्मिलित किया है।

इन दोहों में उन परिस्थितियों एवं उदाहरणों का प्रयोग किया गया है, जिनसे हम और आप अक्सर दो-चार होते रहते हैं। इसीलिए यह दोहे हमारे लिए अत्यंत लाभप्रद एवं सहायक सिद्ध होते हैं, जिनसे हमें रोजमर्रा की परेशानियों को हल करने की प्रेरणा मिलती है। तो देर किस बात की ?

आइए जानें :

1 ) कबीर लहरि समंदर की, मोती बिखरे भाई।
बगुला भेद न जानई, हँसी चुनी चुनी खाई।।

प्रस्तुत दोहा कवि कबीर दास जी द्वारा निर्मित है। वह कहते हैं कि जब समुद्र में लहरें उठती हैं, तब कई सारे मोती बिखर कर किनारे पर आ जाते हैं। बगुला जब इन मोतियों को देखता है, तो वह इसका मूल्य नहीं जान पाता और उन्हें छोड़ देता है किंतु हंस इन मोतियों को चुन - चुन कर खाता है। बहुलमुल्य मोती दोनों को मिलते हैं, परंतु इनसे लाभ केवल एक ही ले पाता है।

तात्पर्य यह है कि सभी के जीवन में अवसर आते हैं। कोई इन अवसरों को पहचानता है एवं उनका इस्तेमाल करता है, परंतु कोई इन्हें पहचान ही नहीं पाता। जो इन अवसरों का मूल्य समझते हैं वह इनका प्रयोग कर जीवन में सफल होते हैं। जो इन अवसरों को जाने देते हैं, वह कुछ प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने जीवन में आए अवसरों को पहचानना सीखना चाहिए। कई बार मौके हमारे सामने होते हैं, किंतु हमें पता ही नहीं चलता। इसीलिए हर अवसर को पहचाने एवं उसका प्रयोग करें।

2 ) बात कहन की रीति में, है अंतर अधिकाय।
एक वचन तैं रिस बढै, एक वचन ते जाय।।

प्रस्तुत दोहा महा कवि वृंद द्वारा रचित है, जहां उन्होंने वाणी का बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रयोग करने की ओर इंगित किया है। मित्रों, शब्दों में बहुत शक्ति होती है। किंतु इस शक्ति का इस्तेमाल करना हमारे हाथों में होता है। एक ही बात यदि भिन्न-भिन्न तरीकों से कही जाए तो उसके भिन्न-भिन्न परिणाम होते हैं।

शब्द तो एक ही होते हैं, किंतु अंतर बोलने के तरीके में होता है जो इन शब्दों से उत्पन्न प्रभाव को बदल देता है। यही समझाते हुए कवि कहते हैं कि अलग-अलग लोगों के बात करने की रीति, अर्थात तरीके में बहुत अंतर होता है। कुछ लोग ऐसे वचन बोलते हैं जिससे प्रेम बढ़ता है एवं सभी मोहित हो जाते हैं।

वहीं कुछ वचन ऐसे होते हैं जिनसे बना बनाया प्रेम भी चला जाता है। प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है हमें सदैव मृदु वचन बोलने चाहिए। मीठे वचन शत्रु को भी मित्र बना सकते हैं।

3 ) पावस देखि रहीम मन, कोयल सधै मौन।
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन।।

प्रस्तुत दोहे में कवि रहीम ने उस स्थिति के बारे में बताया है, जहां अज्ञानीयों का वर्चस्व होता है। ऐसी परिस्तिथि में जो वास्तव में ज्ञानी हैं, उन्हें क्या करना चाहिए? आइए जानें।

रहीम कहते हैं कि वर्षा ऋतु के आने पर कोयल और रहीम दोनों ने ही मौन साध लिया है। अर्थात दोनों अब चुप हो गए हैं। क्योंकि वर्षा ऋतु में मेंढक वक्ता बन गए हैं और सब तरफ केवल उनकी ही आवाज आ रही है। अब हमारी बात भला कौन सुनेगा? मेंढक की कर्कश टर्र-टर्र की ध्वनि में कोयल व रहीम की आवाज दब जाएगी। अतः रहीम ने चुप रहना ही उचित समझा है।

प्रस्तुत दोहे का भावार्थ यह है कि कई ऐसे अवसर आते हैं, जहां अज्ञानी एवं मूर्खों का बोलबाला होता है। अज्ञानी वाचालता पूर्वक अपनी बात जोर-जोर से कहते हैं, जिससे लोग उनकी बातों से प्रभावित होकर उन्हें ही गुणवान मान लेते हैं। ऐसे में अज्ञानी ही आदर के पात्र बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में जहां विद्वानों की बात का कोई मूल्य ना रहे, वहां उन्हें चुप ही रहना चाहिए। अतः आदर न मिलने पर गुणवान को चुप रहना चाहिए।

4 ) धन अरु गेंद जु खेल को दोऊ एक सुभाय।
कर में आवत छिन में, छिन में करते जाय।।

प्रस्तुत दोहे में कवि वृंद ने कहा है कि धन और गेंद का स्वभाव एक समान है। खेल में जो भूमिका गेंद की होती है, वही जीवन में धन की होती है। इसीलिए कवि ने इन दोनों को एक समान बताया है। खेल में गेंद एक व्यक्ति के हाथों से दूसरे और फिर अन्य लोगों के हाथों में जाता है। एक पल को गेंद हमारे, तो दूसरे ही पल दूसरों के हाथों में नजर आता है।

ठीक इसी प्रकार धन भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के हाथों में स्थानांतरित होता रहता है। यह केवल कुछ समय के लिए ही एक व्यक्ति के पास आता है; किंतु फिर वह दूसरे के हाथ में चला जाता है। अतः गेंद की ही भांति धन किसी के पास नहीं टिकता। इसीलिए कहते हैं लक्ष्मी चंचल होती है। यह सदैव एक स्थान पर नहीं रहती।

प्रस्तुत दोहे के माध्यम से कवि ने धन की प्रकृति को समझाया है। यह किसी के भी पास स्थाई रूप से नहीं रहता। अतः मनुष्य को धन के पीछे नहीं भागना चाहिए। धन के लाभ पर अति सुखी हो जाना और धन की हानि से अत्यंत दुखी होना व्यर्थ है।

निष्कर्ष :

तो यह थी कवियों की सुंदर रचनाएं। आशा है आपने इस लेख का आनंद लिया और यहाँ से बहुत कुछ सीख कर जा रहे हैं।


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