धैर्य का महत्व - दोहों की वाणी

धैर्य का महत्व - दोहों की वाणी

  

धैर्य, अर्थात धीरज , यह मनुष्य के 7 गुणों में से एक है। समय-समय पर ज्ञानी - महात्मा एवं महापुरुषों ने जीवन में धैर्य के महत्व पर प्रकाश डाला है, एवं मनुष्य को यह सीख दी है कि कार्य सिद्धि के लिए धैर्य अत्यंत आवश्यक है।

जो व्यक्ति धीरज से काम नहीं लेता उसके कार्य अपूर्ण एवं त्रुटि पूर्ण होते हैं क्योंकि जल्दबाजी में किए गए काम से ना ही मन को संतुष्टि प्राप्त होती है, और ना ही मन शांत होता है।

यदि आप भी जीवन में विवेक के महत्व को और गहराई से जानना चाहते हैं, तो आज का यह लेख आपको अवश्य पढ़ना चाहिए। क्योंकि आज हम आपके लिए लेकर आए हैं कविवर रहीम एवं कबीर दास जी द्वारा लिखित कुछ ऐसे दोहों को, जो आपको धैर्य की महत्व से परिचित कराएंगे।

तो आइए जानते हैं दोहों को :

1 ) बहुत गई थोड़ी रही , व्याकुल मन मत होय।
धीरज सब का मित्र है, करी कमाई न खोय।

जब व्यक्ति का समय बुरा होता है, तब अक्सर वह व्याकुल हो जाता है। कठिन परिस्थितियों में मन को समझाना मनुष्य के लिए कठिन हो जाता है।

इसी पर संत कवि कबीर दास जी ने कहा है कि, - हे मानव ! तुम्हारा संचय किया हुआ चला गया, तुमने बहुत कुछ खो दिया, जीवन की कठिनाइयों से घिर गए हो, किंतु तुम व्याकुल ना हो! यदि तुम्हारे हाथों से बहुत कुछ चला गया है, और बस थोड़ा ही बचा है, तो परेशान मत हो।

कबीरदास जी कहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में व्याकुल होने के स्थान पर यह समझना चाहिए कि यह कठिनाई चिंता एवं दुख एक दिन अवश्य समाप्त होंगी । अतः उनमें धैर्य से काम लेना चाहिए।

कबीर कहते हैं ऐसा ना हो की व्याकुलता के कारण जितना आपके पास बचा है, जितना परिश्रम आपने किया है, वह भी हाथों से निकल जाए । अर्थात व्यर्थ हो जाए । इसीलिए जो बचा है, उसे बचाने के लिए मन में धैर्य धारण करना अति आवश्यक है ।

दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है की कठिन परिस्थितियों में धैर्य ही हमारा सबसे बड़ा मित्र है। जल्दबाजी एवं व्याकुलता में हमारे पास जो बचा है, हम उसे भी खो सकते हैं । अतः व्याकुल ना हो।

2 ) कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूक एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ।

प्रस्तुत दोहे में महान संत कवि कबीर दास जी ने यह संदेश प्रतिपादित किया है कि मनुष्य में धैर्य का होना कितना आवश्यक है। धैर्य के ना होने पर जल्दबाजी में किया गया कार्य अधूरा और त्रुटि पूर्ण होता है।

जिसके परिणाम स्वरूप उचित फल की प्राप्ति नहीं होती। यही बताते हुए इस दोहे में उन्होंने कहा है कि हाथी बिना किसी जल्दबाजी के, धैर्य पूर्वक धीरे-धीरे मन भर कर अपनी पूरी क्षुधा समाप्त करता है। ऐसा करने से वह भोजन पश्चात पूर्णतः तृप्त रहता है।

वहीं दूसरी तरफ कुत्ता अधिक भोजन की तलाश में इधर-उधर भागता रहता है धैर्य हीन होकर एक घर से दूसरे घर की ओर जाता है, किंतु अंत में उसे तृप्ति नहीं मिलती।

यही अंतर है धैर्य धारण करने व ना करने में। कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार धैर्य को धारण कर लेने से हाथी तृप्त रहता है, उसी प्रकार मनुष्य जब धैर्य धारण करता है तो वह अपनी हर सफलता से संतुष्ट होता है।

प्रस्तुत दोहा हमें यह सीख देता है कि हमें अधिक जल्दबाजी में किसी कार्य को संपन्न करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। जो कार्य धीरज के साथ किया जाता है वह तृप्ति एवं संतोष देता है।

3 ) धीरे धीरे रे मना, धीरे धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

प्रस्तुत दोहे में यह संदेश दिया गया है कि धैर्य से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं। परिश्रम भी तभी फलीभूत होता है, जब व्यक्ति में लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पर्याप्त धैर्य हो।

कबीर कहते हैं कि हे मन! धर्य रखो ! धीरज धारण करो ! क्योंकि धैर्य से ही सब कुछ होता है। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यदि मन में समर्पण, कर्म में कठोर परिश्रम, एवं इरादों में शक्ति हो, किंतु मन में धीरज ना हो, तो कठोर परिश्रम का भी परिणाम नहीं मिलता।

जिस प्रकार माली एक नहीं, अपितु सौ घरों को सींचता एवं पोषित करता है, किंतु उसमें फल तभी लगते हैं जब अनुकूल ऋतु आती है। माली यदि पौधों में शीघ्र फल ना आने पर उन्हें सींचना छोड़ दे, तो फल कभी नहीं लगेंगे। किंतु माली ऐसा नहीं करता । वह बड़े संयम के साथ रितु आने तक नित्य प्रतिदिन पौधों को सीचता है और तब उसे फल की प्राप्ति होती है।

इसी प्रकार हमें भी अपने मन में धैर्य धारण करना चाहिए, तभी हमारे कार्य सिद्ध हो सकेंगे। प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कार्य की सिद्धि तभी होती है, जब सही समय आता है। सही समय तक धैर्य रखने वाला ही सफल होता है।

4 ) रहिमन चुप ही बैठिए, देख दिनन की फेर।
जब निकै दिन आईहै, बनत बात नहीं बेर।

प्रस्तुत दोहे में महा कवि रहीम जी ने कहा है कि धीरज रखने से मनुष्य संकट के समय से पार पा लेता है। यदि कठिन परिस्थितियां देखकर मनुष्य व्याकुल हो गया, तो अच्छे समय के आने तक वह पूर्णतः हताश हो जाएगा।

अतः कविवर रहीम कहते हैं कि दिनों का फिर देख कर चुप ही बैठना उचित है। अर्थात जब अच्छा समय बुरे समय में परिवर्तित हो जाए, तो धैर्य से ही चुप रहना अच्छा है।

यह सत्य है कि बुरे समय में बनी हुई बात भी बिगड़ जाया करती है, चारों ओर से निराशा हाथ लगती है, किंतु ऐसे समय में धीरज धारण करना सर्वोत्तम है। क्योंकि जब दिन फिर बदलेंगे और अच्छा समय आएगा तो बिगड़ी बात बनते देर नहीं लगेगी, एवं सभी कार्यों में सफलता मिलेगी। अतः मन में धैर्य धारण करना चाहिए एवं अच्छे समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

निष्कर्ष
तो मित्रो आपने देखा कि कबीर दास जी एवं रहीम जी ने कितनी सुंदरता एवं सरलता से हमें जीवन में धीरज के महत्व को समझाया एवं उसका प्रयोग करना सिखाया है।

कविवर रहीम एवं कबीर दास जी के दोहे आज के समय में भी कितने प्रासंगिक हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि "धैर्य " मनुष्य के उन गुणों में से एक है, जिससे मनुष्य ज्ञानी एवं पराक्रमी बनता है। यह दोहे केवल आज के समय में ही नहीं, अपितु आने वाले हर समय में उतने ही प्रासंगिक एवं उपयोगी सिद्ध होंगे।

यह महापुरुष इस बात से भलीभांति परिचित हैं की सफलता के लिए जितना आवश्यक कठोर परिश्रम है, उतना ही आवश्यक लक्ष्य प्राप्ति तक धैर्य बनाए रखना है।

यदि हम में लक्ष्य की सिद्धि होने तक की प्रतीक्षा करने की क्षमता ही नहीं होगी, तो पहले किए गए सभी प्रयास निरर्थक एवं व्यर्थ सिद्ध होंगे। अतः आज के इन सभी दोहों से सीख ले कर आइए हम संकल्प करें कि हम सभी जीवन में सदैव धैर्यवान बनने की कोशिश करेंगे।


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