चिंता पर अनमोल दोहे

चिंता पर अनमोल दोहे

  

मित्रों, आज की चर्चा का विषय है चिंता। हर व्यक्ति किसी ना किसी कारणवश चिंतित रहता है। किसी को पैसों की, तो किसी को परिवार की, किसी को व्यवसाय, तो किसी को भविष्य से जुड़ी चिंताएं सताती रहती है। चिंता से ग्रसित मनुष्य हमेशा उदास और दुखी रहता है।

किंतु हमें यह समझना होगा कि चिंता करना किसी भी समस्या का निवारण नहीं है। हमें यह भी जानना होगा कि चिंता हमारे लिए कितनी भयावह सिद्ध हो सकती है।

इस स्थिति की गंभीरता को समझाने के लिए आज हम आपके समक्ष कविवर रहीम एवं कबीर दास जी द्वारा रचित कुछ ऐसे दोहे लेकर आए हैं, जिसमें उन्होंने चिंता से जुड़ी कई बातों का वर्णन करते हुए समझाया है कि हर हाल में चिंता का त्याग ही सर्वोत्तम चुनाव है।

यदि आप भी अपने जीवन में किसी चिंता अथवा तनाव से ग्रस्त हैं, तो यह दोहे निश्चय ही आपके लिए सहायक सिद्ध होंगे। तो देर किस बात की? आइए जानते हैं चिंता पर रचे गए निम्नलिखित दोहों को :

1 ) चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए।
वैद्य बिचारा क्या करे, कहाँ तक दवा खवाय।

प्रस्तुत दोहा महान संत कवि कबीर दास जी द्वारा निर्मित है। इस दोहे के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देना चाहा है की चिंता उस असाध्य रोग के समान है, जिसका उपचार किसी भी औषधि से संभव नहीं है।

दोहे में वह कह रहे हैं कि चिंता ऐसी डाकिनी, अर्थात डायन है जो कलेजा भी काट कर खा जाती है। अर्थात चिंता इतनी हानिकारक है कि वह व्यक्ति के हृदय को पूरी तरह मृत के समान बना देती है।

इस चिंता के उपचार के लिए बेचारा वैद्य कुछ नहीं कर सकता। वह कितनी दवा खिलाएगा ? चाहे कितनी भी औषधियां, कितने भी उपचार के तरीके आजमा लिए जाए, किंतु चिंता रूपी रोग का उपचार नहीं हो सकता । क्योंकि यह शरीर के किसी अंग पर नहीं, अपितु व्यक्ति के मन व हृदय पर आघात करती है।

मित्रों, आपने देखा की चिंता किस प्रकार धीरे-धीरे मनुष्य को खाती जाती है। अतः इसे त्याग देना ही सर्वोत्तम है। इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि यदि व्यक्ति चिंता का त्याग नहीं करता है, तो चिंता उसे चिता तक पहुंचा देती है। अतः हमें समस्या के निवारण पर चिंतन करना चाहिए।

2 ) आगि जो लागि समुद्र में, धुँआ न प्रगट होय।
जाने जो जरि मुवा, जाकि लाई होय।

कबीर दास जी अपने इस दोहे से इस ओर इंगित करते हैं कि जब व्यक्ति किसी रोग से ग्रसित होता है, तो उसके शरीर में कई लक्षण दिखाई पड़ते हैं। किंतु चिंता ऐसी स्थिति है जिसका कोई भी लक्षण दिखाई नहीं पड़ता। चिंता ग्रस्त व्यक्ति बाहर से पूरी तरह अच्छा दिखाई देता है, किंतु अंदर ही अंदर चिंता उसे खाती रहती है।

इस दोहे में यही बात बताते हुए कविवर कहते हैं कि जब समुद्र के भीतर आग लगती है, तब उस आग से धुआं नहीं उठता। अर्थात समुद्र की अग्नि ना ही किसी को दिखाई पड़ती है, और ना ही किसी को पता चलती है।

इस परिस्थिति की तुलना कविवर ने व्यक्ति के मन की चिंता से की है और कहा है कि जिस प्रकार समुद्र की अग्नि से धुआं नहीं निकलता, ठीक उसी प्रकार मन रूपी समुद्र में चिंता रूपी अग्नि भी किसी को दिखाई नहीं पड़ती। यह आग केवल वही जान और समझ सकता है, जो खुद इसमें जला हो। अर्थात, जो खुद इस दुखद परिस्थिति से गुजरा हो।

3 ) रहिमन कठिन चितान तै, चिंता को चित चैत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव-समेत॥

इस दोहे के माध्यम से कविवर रहीम जी ने मनुष्य को चिंता न करने की सलाह दी है। वह कहते हैं कि जीवन में आई कठिन चिंताओं का चिंतन छोड़ दो। इन से स्वयं को मुक्त करो और चित्त अर्थात मन का चिंतन करो।

चिंता को त्याग कर मन को चेतने, अर्थात नियंत्रण करने के लिए रहीम ने इसीलिए कहा है क्योंकि चिंता तो प्राण रहित निर्जीव शरीर का दहन करती है, उसे जला देती है, किंतु चिंता तो जीवित प्राणी में प्राण होते हुए ही उसे जलाकर भस्म कर देती है। चिंता मनुष्य को जीवित होते हुए भी मृत के समान बना देती है।

तो मित्रों, इस दोहे से आपने क्या सीखा ? इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि चिंता चिता से भी भयावह है। इससे पहले की चिंता हमें जला दे, हमें इसका त्याग कर अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए। साथ ही हमें समस्या के हल पर चिंतन करना चाहिए, ना की चिंता पर।

4 ) कबिरा चिंता क्या करू, चिंता से क्या होय।
मेरी चिंता हरि करै, चिंता मोहि न कोय।

प्रस्तुत दोहे में कवि कबीर दास जी ने यह संदेश प्रतिपादित किया है कि ईश्वर ने ही सभी प्राणियों को बनाया है, और वही सभी प्राणियों का ख्याल भी रखते हैं।

दोहे में उन्होंने कहा है कि मैं किस बात की चिंता करूं ? चिंता करने से भला क्या होगा ? मेरी चिंता हरि, अर्थात परम ब्रह्म परमेश्वर कर रहे हैं। मुझे कोई भी चिंता नहीं है।

यह दोहा बहुत छोटा है किंतु कबीर दास जी ने इसमें बहुत बड़ी बात कही है। इस दोहे का भाव यह है कि मनुष्य, जो हर पल जीवन को लेकर चिंतित रहते हैं, आज एक तो कल दूसरी चिंता उन्हें सदैव घेरी रहती है । ऐसे व्यक्तियों को कवि ने कहा है कि सब चिंताएं त्याग कर ईश्वर में मन लगाओ। क्योंकि ईश्वर हम सबकी चिंता स्वयं करते हैं।

निष्कर्ष:

तो मित्रों, इस लेख में आपने यह देखा कि किस प्रकार कविवर रहीम एवं कबीर दास जी ने चिंता को मनुष्य के लिए शत्रु के समान बताया है। किसी भी समस्या का हल चिंता नहीं होता। चिंता समस्या को और भी अधिक बढ़ाकर मनुष्य को दिन प्रतिदिन बुरी स्थिति में डालती जाती है।

इसीलिए उत्तम यही है कि हम अपनी सभी चिंताओं का त्याग कर ईश्वर पर विश्वास रखें एवं इस ओर ध्यान दें कि हमारी चिंताओं का निवारण कहां छिपा है। जब हम इस दिशा में अपनी सोंच को मोड़ लेंगे, तो चिंताएं हवा की तरह उड़ जाएंगी।


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