गोस्वामी तुलसीदास के अर्थ सहित दोहे

गोस्वामी तुलसीदास के अर्थ सहित दोहे

  

1 ) सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहिं, सम धीर धरहिं मन माहि।
धीरज धरहूँ विवेक विचारि, छोड़ि सोंच सकल हितकारी।।

प्रस्तुत दोहे के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी ने सुख एवं दुख को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में दर्शाया है, जिसमें व्यक्ति को समान आचरण करना चाहिए। गोस्वामी जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सुख के क्षणों में बहुत अधिक प्रसन्न हो जाता है, और दुख आने पर अत्यधिक दुखी हो जाता है, वह मनुष्य जड़ अर्थात मूर्ख है। इस प्रकार का आचरण रखने से व्यक्ति को कष्ट की प्राप्ति होती है एवं ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में सफल नहीं हो पाता। ना ही सफलता मिलने पर आवश्यकता से अधिक प्रसन्न होना चाहिए, ना ही असफलता आने पर आवश्यकता से अधिक दुखी होना चाहिए।

तुलसीदास जी कहते हैं कि दोनों ही परिस्थितियों में व्यक्ति को अपने मन में धैर्य एवं विचारों में विवेक धारण करना चाहिए। सुख-दुख, सफलता - असफलता दोनों एक ही गाड़ी के दो पहियों के समान है। अर्थात जीवन में कभी सुख तो कभी दुख आना निश्चित है । ऐसे में वास्तव में वही व्यक्ति सफल है जो सुख दुख की चिंता त्याग कर हर परिस्थिति में समान रहता है।

2 ) बिना तेज के पुरुष की, अवशि अवज्ञा होय।
आगि बुझे ज्यों राख की, आप छुवै सब कोय

इस दोहे में तुलसीदास जी ने बताया है कि मनुष्य में तेज, अर्थात श्रेष्ठ गुण होना कितना अनिवार्य है। संसार उसी को महत्व देता है जिसमें आभा हो। यह बताते हुए गोस्वामी जी कहते हैं कि वह व्यक्ति जिसमें कोई तेज नहीं होता, उसकी हर स्थान पर अवज्ञा होती है। ऐसे व्यक्ति की कही गई बातों को ना ही कोई महत्व देता है, और ना ही मानता है। चाहे वह कितनी भी अच्छी या नीतिपरक बातें कहें, उसकी वाणी का कोई मूल्य नहीं होता।

बिना तेज़ के व्यक्ति की यही दशा होती है। यहां तेजवान होने का तात्पर्य है व्यक्ति में गुण कौशल ज्ञान एवं उपलब्धि होना। तुलसीदास जी ने ऐसे व्यक्ति की तुलना उस राख से की है जिस की आग बुझ चुकी है। जिस प्रकार राख की आग गर्म होने पर हर कोई उसे छूने से डरता है किंतु आग के खत्म होते ही ठंडी राख को सब छूने लगते हैं उसी प्रकार जब तक व्यक्ति तेजवान रहता है वह आदर एवं सम्मान का पात्र बना रहता है।

3 ) तुलसी देखी सुबेषु भुलहिं मूढ़ न चतुर नर
सुंदर केकहि पेखु बचन सुधा सम असंन अहि

प्रस्तुत दोहे में गोस्वामी जी बता रहे हैं कि सुवेश, अर्थात अच्छे कपड़े एवं सुंदर वेशभूषा धारण किए हुए व्यक्ति को देखकर सभी धोखा खा जाते हैं, चाहे वह मूर्ख हो या बुद्धिमान। तुलसीदास जी ने यहां यह संदेश प्रतिपादित किया है कि केवल व्यक्ति की वेशभूषा अर्थात बाहरी आवरण देखकर उसके गुण- अवगुण एवं ज्ञान का पता नहीं लगाया जा सकता।

आवश्यक नहीं कि सुंदर वेशभूषा जिस व्यक्ति के पास हो उसके पास ज्ञान, बुद्धि, एवं धर्म जैसे गुण भी हो। और यह भी आवश्यक नहीं कि जिसकी वेशभूषा मनमोहक ना हो वह व्यक्ति उत्तम आचरण एवं विचारों वाला ना हो। जिस प्रकार सुंदर मयूर के पंख अति सुंदर एवं मन को मोह लेने वाले होते हैं, वैसे ही उसकी बोली अमृत के समान मीठी होती है, किंतु उसी मुख से अमृत समान बोली बोलने वाला मयूर का आहार जहरीला सर्प होता है। अर्थात व्यक्ति के गुण उसके ज्ञान एवं चरित्र के परिचायक हैं, उसका बाहरी आवरण नहीं।

4 ) नामु राम को कलपतरु , कलि कल्याण निवासु।
जो सिमरत भयो भांग ते तुलसी तुलसीदास।।

यहां गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम नाम की महिमा का गुणगान करते हुए सभी मनुष्य को बताया है कि ईश्वर का केवल नाम मात्र लेने से ही समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस दोहे में कल्पतरु नामक शब्द का प्रयोग किया गया है। कल्पतरु का मतलब कल्पवृक्ष है जो कि पौराणिक कथाओं में सभी मनोकामना को पूर्ण करने वाले वृक्ष को कहा गया है।

दोहे में तुलसीदास कहते हैं कि राम का नाम कल्पवृक्ष के समान एवं कल्याण का निवास स्थान है। इसका स्मरण करने से सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसमें इतनी अधिक शक्ति है कि इसके जाप से भांग के समान तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया। अर्थात सभी दोषों, सभी अवगुणों से मुक्त होकर निर्मल हो गया। इस दोहे से हमें यह संदेश मिलता है कि ईश्वर की भक्ति हमें सुमार्ग पर ले जाती है।

5 ) तुलसी किए कुसंग थिति, होहिं दाहिने बाम।
कहि सुनि सुकुचिअ सुभखल,रत हरि संकर नाम।।

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदास जी ने बुरी संगती एवं उससे उत्पन्न दूसरों के बारे में बताते हुए कुसंगति का त्याग करने को कहा है। इस दोहे में वह कहते हैं कि बुरे लोगों की संगति में रहने से अच्छे लोगों की भी बदनामी हो जाती है। कुसंगति के कारण बुरे लोगों की ही भांति सज्जन पुरुष भी अपनी प्रतिष्ठा, मान - सम्मान एवं आदर गवां बैठते हैं एवं छोटे हो जाते हैं। इसीलिए बुरी संगति का अवश्यंभावी रूप से त्याग होना चाहिए।

आगे उन्होंने कहा है किसी व्यक्ति का केवल नाम हरी अथवा शंकर हो जाने से ही वह उस सम्मान का भागी नहीं बन जाता। भले ही किसी व्यक्ति का नाम देवी देवता के नाम पर रखा गया हो किंतु उसकी संगति बुरी हो, तो उसे आदर, मान-सम्मान कभी नहीं मिलता।

कुसंगति में रहने वाला व्यक्ति यदि जीवन में सफलता पाना चाहता है अथवा प्रतिष्ठा की कामना रखता है तो ऐसा सोचने वाला केवल निराश होता है। उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती क्योंकि कुसंगति से व्यक्ति का ह्वास होता है। तुलसीदास जी ने इस तथ्य को उजागर करने के लिए उदाहरण दिया है कि बुरी संगति अच्छे व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसी प्रकार धराशाई कर देती है जिस प्रकार मगध राज्य के निकट होने पर पवित्र तीर्थ स्थल विष्णुपद का नाम भी "गया" हो गया।


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