गुरु पर संत कवि कबीर दास जी के उत्कृष्ट दोहे

गुरु पर संत कवि कबीर दास जी के उत्कृष्ट दोहे

  

मित्रों, आज हम आपके लिए महान संत कवि कबीर द्वारा रचित ऐसे दोहे लेकर आए हैं, जिनमें उन्होंने मनुष्य के जीवन में गुरु के महत्व का बखान किया है। 15 वीं सदी के प्रमुख रहस्यवादी कवियों में से एक भगत कबीर जी ने अपनी रचनाओं द्वारा जीवन के हर पहलू को छुआ है। इसी प्रकार कवि ने व्यक्ति के जीवन में गुरु की भूमिका को बताते हुए भी ऐसी कई रचनाएं की हैं, जो हमें बहुत गहरी तस्वीर दिखाते हैं।

यही नहीं, उन्होंने अपने दोहों में गुरु के स्थान को ईश्वर से भी ऊंचा बताया है, और कहा है कि गुरु बिना मनुष्य का जीवन बिल्कुल उसी प्रकार निरर्थक है, जिस प्रकार कुम्हार के बिना गीली मिट्टी का कोई काम नहीं होता।

मित्रों, संत कबीर जी के जीवन में भी विद्वान गुरु थे, जिनका नाम स्वामी रामानंद था। कबीर दास जी एवं उनके गुरु के बारे में एक कथा प्रचलित है I कथा ऐसी है कि कबीर दास जी वैष्णव गुरु रामानंद जी को अपना गुरु बनाना चाहते थे, किन्तु स्वामी जी ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार करने से मना कर दिया। गुरु के प्रति कबीर दास जी की भक्ति इतनी अगाध थी कि उन्होंने निश्चय कर लिया, कि वह स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु बना कर ही रहेंगे।

उन्होंने योजना बनाई कि जब स्वामी जी प्रातः गंगा स्नान के लिए जाएंगे, तब वह उनके मार्ग पर सीढ़ियों के बीच ही लेट जाएंगे। उन्होंने ऐसा ही किया। स्नान के लिए जाते स्वामी रामानंद जी के चरण अकस्मात कबीर दास जी के शरीर पर पड़ गए और उनके मुंह से "राम राम" शब्द निकल पड़ा ।

अपने गुरु के मुख से निकले इसी शब्द को कबीर दास जी ने गुरु द्वारा दी गई दीक्षा के रूप में स्वीकार किया और स्वामी जी को मन से अपना गुरु मान लिया। उस दिन से अंतिम सांस तक वह राम नाम जपते रहे।

मित्रों, आपको बता दें कि कबीर दास जी किसी धर्म, जाति , संप्रदाय को नहीं मानते थे। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता का सदैव साथ दिया एवं समाज में फ़ैली कुरीतियों के विरुद्ध आवाज बुलंद की।

उनकी रचनाओं में धर्म-कर्म के अलावा सामाजिक कुरीतियों के प्रति आक्रोश एवं उन से छुटकारा पाने का हल मिलता है। उन्होंने जीवन पर्यंत मनुष्य को सही मार्ग पर चलने की सीख दी एवं अपनी रचनाओं से न जाने कितने ही लोगों का उद्धार किया।

आज हम संत कबीर दास जी की बहुमूल्य रचनाओं में से कुछ ऐसे ही दोहे लेकर आए हैं, जो आपको आपके जीवन में गुरु की भूमिका से भली भांति परिचित कराएंगे।

आइए जाने इन पांच दोहों को :

1 ) कुमति कुचला चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम जनम का मोरचा, पल में डारे धोय।

प्रस्तुत दोहे के माध्यम से कविवर कबीर दास जी ने यह संदेश दिया है कि गुरु अपने ज्ञान से शिष्य के सभी दुर्गुणों को दूर कर देते हैं। यदि गुरु का ज्ञान ना मिले, तो शिष्य कुबुद्धि से कभी छुटकारा नहीं पा सकता है। यही स्पष्ट करते हुए दोहे की पहली पंक्ति में कवि कबीर दास जी ने कहा है कि ;

चेला अर्थात शिष्य कुमति यानी कि कुबुद्धि रूपी कीचड़ से भरा हुआ है। वहीं दूसरी ओर गुरु के ज्ञान को कबीर दास जी ने जल बताया है, जो शिष्य की कुबुद्धि रूपी कीचड़ को धो डालते हैं। अर्थात गुरु शिष्य को ज्ञान देकर उसके मन मस्तिष्क से सभी बुरे विचारों, अधूरे ज्ञान को दूर कर उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं ।

आगे कवि ने कहा है कि गुरु की दिव्यता ऐसी है कि वह जन्म - जन्मांतर की बुराइयों को भी अपने ज्ञानरूपी जल से क्षण भर में ही धो डालते हैं, अर्थात शिष्य को निर्मल बना देते हैं। इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सदैव गुरु के मार्गदर्शन एवं उनकी छत्रछाया में चलना चाहिए। वह ही है, जो हमारे दुर्गुणों को अपने ज्ञान द्वारा दूर कर हमें निर्मल बना सकते हैं।

2 ) गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ी गढ़ी काटैं खोंट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहैं चोट।

इस दोहे में कबीर दास जी ने हम तक यह संदेश पहुंचाया है कि गुरु अपने मार्गदर्शन द्वारा शिष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाते हैं। गुरु की भूमिका शिष्य के जीवन में अतुलनीय है। कभी डांट फटकार, तो कभी स्नेह, उनकी शिक्षा का ही हिस्सा हैं।

इस दोहे में कविवर ने कहा है कि गुरु एवं शिष्य का संबंध कुम्हार एवं घरे के समान होता है। यहां गुरु को कुम्हार एवं शिष्य को गीली कच्ची मिट्टी के घड़े के समान बताया गया है।

जिस प्रकार कुम्हार घड़े से अनावश्यक मिट्टी निकाल - निकाल कर उसे गढ़ता एवं सुंदर स्वरूप देता है, ठीक उसी प्रकार गुरु घरे रूपी शिष्य में से सभी खोंट, अर्थात दुर्गुण निकालकर उसे गढ़ते हैं एवं गुणी बनाते हैं।

इस प्रक्रिया में कुम्हार की ही भांति गुरु शिष्य को भीतर से अपने प्रेम युक्त हाथों का सहारा देते हैं, और बाहर से चोट करते हैं, अर्थात कड़ाई में डाँट कर रखते हैं । बाहर से डाँट कर गुरु शिष्य को गलत मार्ग पर भटकने से रोकते हैं, एवं अंदर से गुरु का सहारा उसे जीवन में सदा अच्छा करने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार अंततः गुरु अपने शिष्य श्रेष्ठ बनाता है। प्रस्तुत दोहे से कविवर ने खासकर विद्यार्थियों को बहुत बड़ी सीख दी है कि गुरु की भूमिका हम शिष्यों के जीवन में सर्वोपरि है। यदि गुरु हमें डांटते हैं, तो वह हमें उतना ही स्नेह भी करते हैं। अतः गुरु की कड़वी बातों को उनका प्रेम समझकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।

3 ) गुरु गोविंद दोऊ खड़े , काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।

प्रस्तुत दोहे में संत कबीर दास जी ने हमें गुरु की महानता के दर्शन कराए हैं। उन्होंने गुरु के स्थान को ईश्वर से भी ऊंचा बताया है। यह दोहा हमें बताता है कि गुरु ही व्यक्ति को ईश्वर से मिलाते हैं।

पहली पंक्ति में कबीर दास जी ने कहा है कि मेरे समक्ष गुरु एवं गोविंद, अर्थात साक्षात परम ब्रह्म परमेश्वर खड़े हैं। इस स्थिति में मैं पहले किसे प्रणाम करूं?

पहले उस ईश्वर को नमन करूं, जिसने मुझे यह जीवन दिया है, या पहले अपने उस गुरु के चरण स्पर्श करूं, जिसने जीवन का अर्थ बताया है? इस दुविधा से निकलकर तब कबीरदास जी कहते हैं कि - हे गुरु! मैं तुम पर पर बलिहारी हूं, तुम्हें शत-शत नमन है!

मैं पहले तुम्हारे ही चरणों का स्पर्श करूँगा क्योंकि तुम से ही मैंने गोविंद को जाना है। तुम ना होते तो मैं ईश्वर को जान ही ना पाता । अतः पहले मैं गुरु के चरण छू लूंगा।

प्रस्तुत दोहे का भाव यह है कि कबीर ने गुरु के स्थान को ईश्वर से ऊंचा बताया है और कहां है कि गुरु ही हैं जो शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की तरफ लाकर उसे परम ब्रह्म परमेश्वर से परिचित कराते हैं । उन्हें पाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वह ना हो तो मनुष्य ईश्वर को जान ही ना पाएगा।

इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि गुरु के प्रति ईश्वर के समान ही श्रद्धा रखनी चाहिए । व्यक्ति के जीवन में ईश्वर से भी अधिक गुरु सर्वोपरि है। गुरु की वाणी को भगवान के आदेश एवं उपदेश को स्वीकार करना चाहिए।

4) गुरु बिन ज्ञान न होत है , गुरु बिन दिशा अज्ञान।
गुरु बिन इंद्रिय न सधे, गुरु बिन बढे न शान।

प्रस्तुत दोहे में कवि कबीर दास जी ने गुरु की महिमा का बखान करते हुए हमें बताया है कि यदि गुरु ना हो, तो व्यक्ति कभी काबिल नहीं बन सकता I गुरु केवल ज्ञान ही प्रदान नहीं करते, अपितु शिष्य के जीवन के हर एक पहलू को सुंदर एवं श्रेष्ठ बनाते हैं जिससे शिष्य उत्तम गुणों से परिपूर्ण होकर समाज में प्रतिष्ठा का भागी बनता है।

दोहे की पहली पंक्ति में कविवर कबीरदास जी कहते हैं कि बिना गुरु के ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है। यदि गुरु ना हो तो व्यक्ति अज्ञानी ही रह जाएगा। गुरु के मार्गदर्शन के बिना व्यक्ति जीवन की दिशा एवं दशा नहीं जान पाता। वह अपने जीवन के उद्देश्य से अनभिज्ञ ही रह जाता है। गुरु ही है जो उसे सही दिशा दिखाते हैं ।

कवि वर आगे कहते हैं कि गुरु के ना होने पर व्यक्ति अपनी इंद्रियों को भी कभी नहीं साध सकता । गुरु ही हैं, जो शिष्य को अपने चंचल मन को नियंत्रित करना सिखाते हैं ।

इन सबके अलावा गुरु के बिना व्यक्ति की शान भी नहीं बढ़ सकती। गुरू से ही व्यक्ति को नीति, धर्म, कर्म, आचरण की शिक्षा मिलती है, जिससे वह समाज में आदर, मान - सम्मान का पात्र बनता है।

गुरु के बिना इन सब में से कुछ भी संभव नहीं है। अर्थात सर पर गुरु का हाथ ना होने से व्यक्ति अपने जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता।

5 ) गुरु को सिर राखीये, चलिए आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहीं।

ऊपर लिखे हुए दोहे में भगत कबीर जी ने कहा है कि यदि शिष्य गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान, रीति नीति, एवं उपदेशों को सदैव स्मरण रखें, तो उसे किसी का भय नहीं रह जाता।

जीवन पर्यन्त गुरु की आज्ञा अनुसार चलने वाले व्यक्ति जीवन में सदैव उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त रहते हैं। इस दोहे की पहली पंक्ति कहती है कि गुरु को सर पर रखना चाहिए । अर्थात गुरु को सिर मोर, सिर का मुकुट बनाकर रखिए।

यहां गुरु को सिर का मुकुट बनाने से तात्पर्य है कि गुरु के वचनों को सबसे बड़ा आदेश मानकर चलिए। अर्थात कोई भी कार्य गुरु की सहमति एवं उनकी आज्ञा बिना नहीं करना चाहिए। आगे कबीर कहते हैं कि ऐसे दास को, जो हर पथ पर गुरु की आज्ञा होने के बाद ही पैर रखता हो, उसे तीनों लोकों का भी कोई भय नहीं है।

गुरु के बताए मार्ग पर चलने वाले का तीनो लोकों अर्थात आकाश, पाताल एवं स्वर्ग से, कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। कबीर ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि गुरु सदैव शिष्य के हित की ही बात करते हैं ।

वह अपने ज्ञान द्वारा शिष्य को इतना सशक्त बना देते हैं कि कोई भी उस पर उंगली नहीं उठा पाता। प्रस्तुत दोहे से हमें यह शिक्षा मिली है कि गुरु की आज्ञा मानकर चलने वाले का तीनों लोगों में आदर होता है । अतः कभी गुरु की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।

निष्कर्ष :

तो पाठकों, आपने देखा एवं जाना की महान कवि कबीर दास जी ने गुरु पर कितनी सुंदर दोहों की रचना की है। ऊपर से अति सुंदर दिखने वाले यह दोहे अंदर से बहुत गूढ़ ज्ञान समेटे हुए है।

जिसने इस ज्ञान को जान लिया, वह जीवन में कभी अवनति नहीं कर सकता। प्रस्तुत दोहे में बार-बार कबीर ने गुरु की आज्ञा मानने की बात बताई है।उन्होंने यह भी बताया है कि व्यक्ति के जीवन में गुरु के स्थान से बढ़कर और कोई नहीं है। कबीर दास जी के इन सभी उपदेशों को आत्मसात कर अपने गुरुओं के प्रति मन में सदैव श्रद्धा भाव रखें एवं उनकी आज्ञा अनुसार कर्म करें । निश्चय ही आप का सदैव भला होगा।


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