आलस्य न करने की सीख देते अनमोल दोहे

आलस्य न करने की सीख देते अनमोल दोहे

  

आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। आलस वह भावना है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों को करने की अनिच्छा व्यक्त करता है। इस आलस्य के कारण हमने अपने जीवन में न जाने कितने ही दिन, कितने ही घंटे, और कितने ही क्षण व्यर्थ कर दिए हैं। मनुष्य को यह आभास भी नहीं होता की वह आलस में किस तरह लिप्त है।

आलस्य केवल कामना करने की अनिच्छा नहीं है। आलस्य के प्रभाव में व्यक्ति ईश्वर का ध्यान करना भी भूल जाता है, अपने कर्म एवं दायित्व से मुंह मोड़ लेता है, अपने जीवन की सार्थकता को नष्ट कर देता है और अंत में केवल पछताता रह जाता है।

महापुरुषों ने इस दोष का भली-भांति अपनी रचनाओं में चित्रण किया है। आज आलस्य पर आधारित कुछ दोहे हम आपके लिए लेकर आए हैं, जो कवि वर रहीम एवं कबीर दास जी द्वारा लिखे गए हैं। यह दोहे आपको जीवन में आलस्य से छुटकारा पाने एवं कर्म करने की ओर अग्रसर होने में मार्गदर्शक साबित होंगे। आइए आनंद ले इन अनमोल दोहों का :

1 ) रात गँवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जनम अनमोल सा, कौड़ी बदले जाय।।

प्रस्तुत दोहे में कविवर कबीर दास जी ने बताया है कि मानव जीवन बहुत ही मूल्यवान है , किंतु हम मनुष्य इस जन्म का सार्थक उपयोग नहीं करते।

उन्होंने कहा है कि हे मनुष्य ! तुमने रात के समय तुम सोते रहे, कुछ नहीं किया और इस प्रकार तुमने रात गँवा दी, अर्थात नष्ट कर दिया। दिन के समय को तुमने खाने पीने में नष्ट कर दिया, तब भी तुमने कुछ भी कर्म नहीं किया।

इसी तरह रात दिन आलस्य में पढ़कर हर दिन तुम गवाते जा रहे हो। इस मानव जीवन को अति बहुमूल्य बताते हुए कबीर कहते हैं कि यह जन्म हीरे के समान अनमोल था ।

जिसका मूल्य तुमने ना समझा और इसे व्यर्थ कर दिया, जिससे इस हीरे के समान जन्म का मूल्य अब केवल एक कौड़ी जितना ही रह गया है । अर्थात इस जन्म का अब कोई मोल नहीं बचा।

शिक्षा

इस दोहे ने हम सभी को यह शिक्षा दी है कि हमें समझना चाहिए कि हमारा यह जन्म बहुत बहुमूल्य है, जिसका एक क्षण कीमती है । इन क्षणों को बर्बाद कर हम अपने इस जीवन के मूल्य को स्वयं ही कम कर रहे हैं। अतः हर एक पल का सदुपयोग करें ताकि हमारा जीवन सार्थक हो सके।

2 ) कबीर सुता क्या करे, जागी ना जपे मुरारी ।
एक दिन तू भी सोवेगा, लंबे पांव पसारी।।

प्रस्तुत दोहे में संत कवि कबीर दास ने कहा है कि: हे मानव ! तुम क्यों निद्रा में हर एक क्षण सोए रहते हो ? जागकर मुरारी, अर्थात ईश्वर का नाम क्यों नहीं लेते ? क्यों उनका सुमिरन नहीं करते ?

मानव ! नींद से जाग कर ईश्वर का ध्यान करो, क्योंकि एक दिन तो ऐसा आना ही है, जब तुम लंबे पांव पसार कर सो जाओगे और फिर चाह कर भी जाग न पाओगे।

प्रस्तुत दोहे में सोए रहने का तात्पर्य अज्ञान में डूबे रहने से है। कबीर दास जी मनुष्यों को बता रहे हैं कि मनुष्य ज्ञान रूपी निद्रा में लिप्त रहता है, और परम ज्ञान प्राप्त नहीं करता।

परम ज्ञान ईश्वर की भक्ति है । स परम ज्ञान को प्राप्त कर मनुष्य को सजग हो ईश्वर की भक्ति करनी होगी नहीं तो एक दिन सभी को सदैव के लिए सोना ही है, अर्थात मृत्यु को प्राप्त होना ही है। तो फिर जितने दिन जाग सकते हैं उतने दिन जाग कर ईश्वर का ध्यान क्यों नहीं प्राप्त करते?

शिक्षा :

प्रस्तुत दोहे में कबीर ने हम तक यह संदेश पहुंचाया है, एक दिन जीवन खत्म हो जाएगा , क्योंकि जीवन नश्वर है। तब चाह कर भी हम खुद को जगा नहीं पाएंगे, इसलिए जितना समय हमारे पास है उस समय को हम ईश्वर की भक्ति में लगाएं।

3 ) रहिमन आलस भजन में , विषय सुखहि लपटाय।
घास चरै पसु स्वाद तै, गुर गुलिलाएं खाय।।

प्रस्तुत दो महान कवि एवं विचारक अब्दुर रहीम खान - ए - खाना द्वारा लिखा गया है, जिन्हें हम सभी रहीम के नाम से जानते हैं। प्रस्तुत दोहे में रहीम ने बताया है कि मनुष्य को जहां भौतिक सुख मिलता दिखाई पड़ता है, वह वहां सारा आलस्य त्याग देता है । किंतु जहां उसे वास्तविक सुख मिलता है, वहां वह आलसी बन जाता है।

दोहे के प्रारंभ में रहीम ने कहा है कि भजन कीर्तन में, ईश्वर के ध्यान आदि में मानव आलसी बन जाता है, किंतु विषय वस्तु अर्थात, भौतिक सुख में सदैव लिपटा रहता है।

मनुष्य का यह आचरण ठीक पशु के समान है। जिस प्रकार पशु वह घास ही स्वाद ले कर खाते हैं, जो बेस्वाद है । किंतु वह गुड़, जो उनके लिए स्वास्थ्यवर्धक एवं हितकारी है, एवं अत्यंत स्वादिष्ट है, वह कभी उसे स्वयं नहीं खाते । उनके मूंह में गुड़ को बल पूर्वक ठूसना पड़ता है, तभी जाकर वह उसे खाते हैं।

शिक्षा :

इस दोहे में रहीम ने यह शिक्षा दी है कि मनुष्य के लिए वास्तव में जो अच्छा है, मनुष्य उससे ही भागता है, और जो विषय वस्तु केवल सुख प्रदान करते हैं, उस में लिप्त रहता है। क्योंकि उसे लगता है कि यह भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है, किंतु यह हमारा भ्रम है।

4 ) काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

कबीर दास जी द्वारा यह लिखा गया उन लोगों के लिए है जो आलस्य के कारण अपने दायित्व से सदैव भागते रहते हैं। कविवर ने ऐसे लोगों को इस दोहे के माध्यम से आलस्य को त्याग देने का संदेश दिया है।

वह कहते हैं कि जो काम आपको कल करने हैं, वह आज ही संपन्न कर ले, एवं जो आपको आज करने हैं, वह अभी, इसी क्षण ही संपन्न कर ले। उस कार्य के लिए एक निश्चित समय का इंतजार ना करें। क्योंकि जीवन तो कुछ ही समय में खत्म हो जाएगा। प्रलय होने के लिए एक पल ही काफी है , फिर आप क्या कर पाएंगे।

शिक्षा :

इस दोहे में कवि ने यह संदेश दिया है कि यदि हम आज के काम कल और कल के काम परसों पर छोड़ते रहें, तो फिर वह काम कभी नहीं कर पाएंगे क्योंकि जीवन बहुत छोटा है। अतः समय की महत्ता को समझे एवं हर एक क्षण का प्रयोग करें। इसे आलस्य में गवाना सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।

5 ) पाछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।
अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

प्रस्तुत दोहे में कवि व कवि कबीर ने कहा है कि समय पर कर्म ना करने से जब समय हाथ से निकल जाता है, तो पछता कर कोई लाभ नहीं है। इसीलिए वर्तमान समय में आलस्य कर उसे गवाने के स्थान पर अपने दायित्व का निर्वाह करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

यही समझाते हुए कबीर ने दोहे की पहली पंक्ति में कहा है कि पीछे के दिन निकल गए, अर्थात बीता समय बीत गया, किंतु हमने हरि से हृदय नहीं लगाया, अर्थात ईश्वर का ध्यान नहीं किया, कुछ भी सार्थक नहीं किया।

सुख के क्षणों में हम सुख में ही लीन रहे, तब हमें ईश्वर का ध्यान नहीं आया। अब जब समय बीत चुका है तब पछतावा करके क्या प्राप्त होने वाला है ?

कवि ने इस परिस्थिति की तुलना उस खेत से की है जिसका किसान फसल के हरे -भरे होने के समय ध्यान नहीं देता, और परिणाम स्वरूप पक्षी सभी बीजों को खा जाते हैं। कवि कहते हैं कि जब ध्यान दिया जाना चाहिए था, तब तो ध्यान नहीं दिया, तब तो कर्म नहीं किया और अब जब चिड़िया खेत के दाने खा गई है तो पछताते क्यों हो।

शिक्षा :

इस दोहे से हमें कबीर दास जी ने यह अनमोल संदेश दिया है कि इससे पूर्व कि हमारे हाथ से समय निकल जाए, और हम हाथ मलते रह जाएं, हमें खुद को जागरूक कर लेना चाहिए । इस समय को हमें ईश्वर के चिंतन मनन में लगाना चाहिए।

निष्कर्ष

तो पाठकों, आपने देखा कि किस प्रकार इन महापुरुषों ने अपनी अलग-अलग रचनाओं से आलस्य को मनुष्य के जीवन कि एक विडंबना बताया है।

जो व्यक्ति आलस्य करता है वह अपना जीवन व्यर्थ कर बैठता है। समय-समय पर इसी तरह कई रचनाएं होती रही है जिसने मनुष्य को आलस्य के प्रति जागरूक होने की सीख दी है। आशा है कि आप इस लेख में आलस न करने एवं समय के सदुपयोग करने की सीख को कभी नहीं भूलाएंगे।


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