Meenal Jain
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सकरात्मक सोच हमें सुखी रखती है.jpg

किसी गांव में दो संत रहते थे। दोनों संत पूजा करना, प्रवचन देना, यज्ञ करना आदि धार्मिक कार्य करते थे और बदले में जो भिक्षा मिल जाती थी उससे अपना जीवन यापन करते थे। दोनों संतो की झोपड़ी एक खेत के पास साथ में बनी हुई थी। एक दिन दोनों संत भिक्षा मांगने के लिए गांव के बाहर गए हुए थे। उस दिन बहुत तेज आंधी और तूफान आया।

जब एक संत भिक्षा मांगकर बापस लौटा तो उसने देखा कि झोपड़ी पूरी तरह से नष्ट हो गयी है। यह देखकर वह संत रोने लगा। उसने भगवान को कोसते हुए कहा -कि हे भगवान मैं रोज आपकी पूजा करता हूँ । दिन में कई बार आपके नाम की माला फेरता हूँ लेकिन फिर भी आपने मेरी झोपड़ी पूरी तरह से नष्ट कर दी जबकि दूसरे लोगो के घर को कोई भी नुकसान नहीं हुआ है।

जब थोड़े देर बाद दूसरा संत पहुंचा तो गिरी हुई झोपड़ी को देखकर उसने भगवान को धन्यबाद दिया और बोला कि हे भगवान आज आपने मेरी रक्षा कर ली। यदि में झोपड़ी में होता तो शायद आज जिन्दा नहीं बचता। आपको मेरी कितनी चिंता है। आपने मेरे पूजा पाठ और भक्ति को व्यर्थ नहीं जाने दिया। आज से मेरा आप के प्रति विश्वास और अधिक बढ गया है। इसके बाद उस संत ने दूसरे संत को समझाया और उसके साथ मिलकर फिर से झोपड़ी बनाना शुरू की और कुछ ही दिनों में दोनों ने पहले से अच्छी और मजबूत झोपड़ी बना ली।

इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि यदि हम सकरात्मक सोच के साथ किसी समस्या को देखेंगे तो हम कभी भी दुखी नहीं होंगे। जबकि नकरात्मक सोच हमें निराश करती है। सकरात्मक सोच हमें एक बार फिर से अपने लक्ष्य की ओर प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है।

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